Couplets Poetry (page 249)
तारीकियाँ क़ुबूल थीं मुझ को तमाम उम्र
नफ़स अम्बालवी
सारी गवाहियाँ तो मिरे हक़ में आ गईं
नफ़स अम्बालवी
निगाहों के मनाज़िर बे-सबब धुंधले नहीं पड़ते
नफ़स अम्बालवी
मिलते हैं मुस्कुरा के अगरचे तमाम लोग
नफ़स अम्बालवी
मिरे ख़याल की पर्वाज़ बस तुम्हीं तक थी
नफ़स अम्बालवी
मरने को मर भी जाऊँ कोई मसअला नहीं
नफ़स अम्बालवी
जब भी उस दीवार से मिलता हूँ रो पड़ता हूँ मैं
नफ़स अम्बालवी
इस शहर में ख़्वाबों की इमारत नहीं बनती
नफ़स अम्बालवी
इंकार कर रहा हूँ तो क़ीमत बुलंद है
नफ़स अम्बालवी
हमें दुनिया फ़क़त काग़ज़ का इक टुकड़ा समझती है
नफ़स अम्बालवी
हमारी ज़िंदगी जैसे कोई शब भर का जल्सा है
नफ़स अम्बालवी
हमारी राह से पत्थर उठा कर फेंक मत देना
नफ़स अम्बालवी
अपने दराज़-क़द पे बहुत नाज़ था जिन्हें
नफ़स अम्बालवी
अब उन की ख़्वाब-गाहों में कोई आवाज़ मत करना
नफ़स अम्बालवी
अब तक तो इस सफ़र में फ़क़त तिश्नगी मिली
नफ़स अम्बालवी
अब कहाँ तक पत्थरों की बंदगी करता फिरूँ
नफ़स अम्बालवी
ये जानता है पलट कर उसे नहीं आना
नईम जर्रार अहमद
या हुस्न है ना-वाक़िफ़-ए-पिंदार-ए-मोहब्बत
नईम जर्रार अहमद
मान टूटे तो फिर नहीं जुड़ता
नईम जर्रार अहमद
मैं ख़ुद को सामने तेरे बिठा कर
नईम जर्रार अहमद
जितनी आँखें थीं सारी मेरी थीं
नईम जर्रार अहमद
इश्क़ वो चार सू सफ़र है जहाँ
नईम जर्रार अहमद
इश्क़ तू भी ज़रा टिका ले कमर
नईम जर्रार अहमद
एक मंज़िल है मुख़्तलिफ़ राहें
नईम जर्रार अहमद
ये तमाशा-ए-इल्म-ओ-हुनर दोस्तो
नईम रज़ा भट्टी
पस-ए-पर्दा बहुत बे-पर्दगी है
नईम रज़ा भट्टी
इस को मैं इंक़लाब कहता हूँ
नईम रज़ा भट्टी
बात ये है कि बात कोई नहीं
नईम रज़ा भट्टी
अपनी बे-ए'तिदालियों के सबब
नईम रज़ा भट्टी
वो जितनी ख़ुद-नुमाई कर रहा है
नईम अख़्तर ख़ादिमी