Couplets Poetry (page 251)
सारे सवाल आसान हैं मुश्किल एक जवाब
नदीम भाभा
मोहब्बत, हिज्र, नफ़रत मिल चुकी है
नदीम भाभा
मोहब्बत ने अकेला कर दिया है
नदीम भाभा
मैं लौ में लौ हूँ, अलाव में हूँ अलाव 'नदीम'
नदीम भाभा
कुछ इस लिए भी अकेला सा हो गया हूँ 'नदीम'
नदीम भाभा
हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं
नदीम भाभा
दिल से इक याद भुला दी गई है
नदीम भाभा
दिल मुब्तला-ए-हिज्र रिफ़ाक़त में रह गया
नदीम भाभा
बद-नसीबी कि इश्क़ कर के भी
नदीम भाभा
और कोई पहचान मिरी बनती ही नहीं
नदीम भाभा
मालूम नहीं नींद किसे कहते हैं लेकिन
नदीम अहमद
कुछ दिनों दश्त भी आबाद हुआ चाहता है
नदीम अहमद
कभी तो यूँ कि मकाँ के मकीं नहीं होते
नदीम अहमद
कभी तो लगता है ये उज़्र-ए-लंग है वर्ना
नदीम अहमद
इश्क़ में ख़ैर था जुनूँ लाज़िम
नदीम अहमद
दिल का शजर तो और भी पलने की आड़ में
नदीम अहमद
ज़ुल्फ़ को क्यूँ जकड़ के बाँधा है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ज़ुल्फ़ का हाल तक कभी न सुना
मुज़्तर ख़ैराबादी
ज़ाहिद तो बख़्शे जाएँ गुनहगार मुँह तकें
मुज़्तर ख़ैराबादी
ज़बाँ क़ासिद की 'मुज़्तर' काट ली जब उन को ख़त भेजा
मुज़्तर ख़ैराबादी
यूँ कहीं डूब के मर जाऊँ तो अच्छा है मगर
मुज़्तर ख़ैराबादी
ये तो समझा मैं ख़ुदा को कि ख़ुदा है लेकिन
मुज़्तर ख़ैराबादी
ये तो मुमकिन नहीं मोहब्बत में
मुज़्तर ख़ैराबादी
ये पैदा होते ही रोना सरीहन बद-शुगूनी है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ये नक़्शा है कि मुँह तकने लगा है मुद्दआ' मेरा
मुज़्तर ख़ैराबादी
यही सूरत वहाँ थी बे-ज़रूरत बुत-कदा छोड़ा
मुज़्तर ख़ैराबादी
यहाँ से जब गई थी तब असर पर ख़ार खाए थी
मुज़्तर ख़ैराबादी
याद करना ही हम को याद रहा
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो शायद हम से अब तर्क-ए-तअल्लुक़ करने वाले हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो क़ुदरत के नमूने क्या हुए जो उस में पहले थे
मुज़्तर ख़ैराबादी