Couplets Poetry (page 252)
वो पास आने न पाए कि आई मौत की नींद
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो पहली सब वफ़ाएँ क्या हुईं अब ये जफ़ा कैसी
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो मज़ाक़-ए-इश्क़ ही क्या कि जो एक ही तरफ़ हो
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो करेंगे वस्ल का वा'दा वफ़ा
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो कहते हैं ये सारी बेवफ़ाई है मोहब्बत की
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो कहते हैं कि क्यूँ जी जिस को तुम चाहो वो क्यूँ अच्छा
मुज़्तर ख़ैराबादी
वो गले से लिपट के सोते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
वक़्त-ए-आख़िर क़ज़ा से बिगड़ेगी
मुज़्तर ख़ैराबादी
वक़्त दो मुझ पर कठिन गुज़रे हैं सारी उम्र में
मुज़्तर ख़ैराबादी
वक़्त आराम का नहीं मिलता
मुज़्तर ख़ैराबादी
वहाँ जा कर किए हैं मैं ने सज्दे अपनी हस्ती को
मुज़्तर ख़ैराबादी
उठते जोबन पे खिल पड़े गेसू
मुज़्तर ख़ैराबादी
उठे उठ कर चले चल कर थमे थम कर कहा होगा
मुज़्तर ख़ैराबादी
उस से कह दो कि वो जफ़ा न करे
मुज़्तर ख़ैराबादी
उस का भी एक वक़्त है आने दो मौत को
मुज़्तर ख़ैराबादी
उन्हों ने क्या न किया और क्या नहीं करते
मुज़्तर ख़ैराबादी
उन को आती थी नींद और मुझ को
मुज़्तर ख़ैराबादी
उन का इक पतला सा ख़ंजर उन का इक नाज़ुक सा हाथ
मुज़्तर ख़ैराबादी
उम्र सब ज़ौक़-ए-तमाशा में गुज़ारी लेकिन
मुज़्तर ख़ैराबादी
उड़ा कर ख़ाक हम काबे जो पहुँचे
मुज़्तर ख़ैराबादी
तुम्हें चाहूँ तुम्हारे चाहने वालों को भी चाहूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
तुम्हें चाहूँ तुम्हारे चाहने वालों को भी चाहूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
तुम्हारी जल्वा-गाह-ए-नाज़ में अंधेर ही कब था
मुज़्तर ख़ैराबादी
तुम क्यूँ शब-ए-जुदाई पर्दे में छुप गए हो
मुज़्तर ख़ैराबादी
तुम अगर चाहो तो मिट्टी से अभी पैदा हों फूल
मुज़्तर ख़ैराबादी
तू न आएगा तो हो जाएँगी ख़ुशियाँ सब ख़ाक
मुज़्तर ख़ैराबादी
ठहरना दिल में कुछ बेहतर न जाना
मुज़्तर ख़ैराबादी
तेरी उलझी हुई बातों से मिरा दिल उलझा
मुज़्तर ख़ैराबादी
तेरी रहमत का नाम सुन सुन कर
मुज़्तर ख़ैराबादी
तेरे मूए-ए-मिज़ा खटकते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी