Couplets Poetry (page 254)
नज़र के सामने का'बा भी है कलीसा भी
मुज़्तर ख़ैराबादी
नमक-पाश ज़ख़्म-ए-जिगर अब तो आ जा
मुज़्तर ख़ैराबादी
नहीं मंज़ूर जब मिलना तो वा'दे की ज़रूरत क्या
मुज़्तर ख़ैराबादी
नहीं हूँ मैं तो तिरी बंदगी के क्या मा'नी
मुज़्तर ख़ैराबादी
न उस के दामन से मैं ही उलझा न मेरे दामन से ये ही अटकी
मुज़्तर ख़ैराबादी
न रो इतना पराए वास्ते ऐ दीदा-ए-गिर्यां
मुज़्तर ख़ैराबादी
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी
मुज़्तर ख़ैराबादी
मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत क़द्र-दाँ होती तो फिर काहे का रोना था
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत में किसी ने सर पटकने का सबब पूछा
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत का असर फिर देखना मरने तो दो मुझ को
मुज़्तर ख़ैराबादी
मोहब्बत बुत-कदे में चल के उस का फ़ैसला कर दे
मुज़्तर ख़ैराबादी
मियान-ए-हश्र ये काफ़िर बड़े इतराए फिरते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरी हस्ती से तो अच्छी हैं हवाएँ यारब
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरी अरमान भरी आँख की तासीर है ये
मुज़्तर ख़ैराबादी
मिरे उन के तअ'ल्लुक़ पर कोई अब कुछ नहीं कहता
मुज़्तर ख़ैराबादी
मिरे गुनाह ज़ियादा हैं या तिरी रहमत
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरे ग़ुबार की ये तअ'ल्ली तो देखिए
मुज़्तर ख़ैराबादी
मिरे दल ने झटके उठाए हैं कितने ये तुम अपनी ज़ुल्फ़ों के बालों से पूछो
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरे अश्कों की रवानी को रवानी तो कहो
मुज़्तर ख़ैराबादी
मिरा रोना हँसी-ठट्ठा नहीं है
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरा रंग रूप बिगड़ गया मिरा यार मुझ से बिछड़ गया
मुज़्तर ख़ैराबादी
मेरा दिल-ए-'मुज़्तर' बुत-ए-काफ़िर से लगा है
मुज़्तर ख़ैराबादी
मसीहा जा रहा है दौड़ कर आवाज़ दो 'मुज़्तर'
मुज़्तर ख़ैराबादी
मैं तिरी राह-ए-तलब में ब-तमन्ना-ए-विसाल
मुज़्तर ख़ैराबादी
मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मुज़्तर ख़ैराबादी
मैं मसीहा उसे समझता हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
मदहोश ही रहा मैं जहान-ए-ख़राब में
मुज़्तर ख़ैराबादी
लुत्फ़-ए-क़ुर्बत है मय-परस्ती में
मुज़्तर ख़ैराबादी