Couplets Poetry (page 255)
लड़ाई है तो अच्छा रात-भर यूँ ही बसर कर लो
मुज़्तर ख़ैराबादी
क्या असर ख़ाक था मजनूँ के फटे कपड़ों में
मुज़्तर ख़ैराबादी
कुछ न पूछो कि क्यूँ गया काबे
मुज़्तर ख़ैराबादी
कूचा-ए-यार से यारब न उठाना हम को
मुज़्तर ख़ैराबादी
कोई ले ले तो दिल देने को मैं तय्यार बैठा हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
कोई अच्छा नज़र आ जाए तो इक बात भी है
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी ने न देखा तिरे हुस्न को
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी के तीर को छाती से हम लगाए रहे
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी के कम हैं किसी के बहुत मगर ज़ाहिद
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी के कम हैं किसी के बहुत मगर ज़ाहिद
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी के दर्द-ए-मोहब्बत ने उम्र भर के लिए
मुज़्तर ख़ैराबादी
किसी का जल्वा-ए-रंगीं ये कहता है इन्हें पूजो
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़्वाहिश-ए-दीद पे इंकार से आते हैं मज़े
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़ुदा भी जब न हो मालूम तब जानो मिटी हस्ती
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़ूब इस दिल पे तिरी आँख ने डोरे डाले
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़िज़र भी आप पर आशिक़ हुए हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़िदमत-ए-गश्त बगूलों को तो दी सहरा में
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़त फाड़ के फेंका है तो लिक्खा भी मिटा दो
मुज़्तर ख़ैराबादी
ख़ाल-ओ-आरिज़ का तसव्वुर है हमारे दिल में
मुज़्तर ख़ैराबादी
कैसे दिल लगता हरम में दौर-ए-पैमाना न था
मुज़्तर ख़ैराबादी
कहीं जो बुलबुल ने देख पाया तो मेरी उस की नहीं बनेगी
मुज़्तर ख़ैराबादी
कह दो साक़ी से कि प्यासा न निकाले मुझ को
मुज़्तर ख़ैराबादी
काबे में हम ने जा के कुछ और हाल देखा
मुज़्तर ख़ैराबादी
जो पूछा मुँह दिखाने आप कब चिलमन से निकलेंगे
मुज़्तर ख़ैराबादी
जो पूछा दिल हमारा क्यूँ लिया तो नाज़ से बोले
मुज़्तर ख़ैराबादी
जिए जाते हैं पस्ती में तिरे सारे जहाँ वाले
मुज़्तर ख़ैराबादी
जितने बुत हैं मैं सब पे मरता हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
जनाब-ए-ख़िज़्र राह-ए-इश्क़ में लड़ने से क्या हासिल
मुज़्तर ख़ैराबादी
जलवा-ए-रुख़सार-ए-साक़ी साग़र-ओ-मीना में है
मुज़्तर ख़ैराबादी
जलेगा दिल तुम्हें बज़्म-ए-अदू में देख कर मेरा
मुज़्तर ख़ैराबादी