Couplets Poetry (page 257)
दिल उन को मुफ़्त देने में दुश्मन को रश्क क्यूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
दिल क्या करे जो राज़ मोहब्बत का खुल गया
मुज़्तर ख़ैराबादी
दिल को मैं अपने पास क्यूँ रक्खूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
दिल काम का नहीं तो न लो जान नज़्र है
मुज़्तर ख़ैराबादी
धोके से बुला कर जो मिला था तो वो मुझ से
मुज़्तर ख़ैराबादी
देख कर काबे को ख़ाली में ये कह कर आ गया
मुज़्तर ख़ैराबादी
दम-ए-ख़्वाब-ए-राहत बुलाया उन्हों ने तो दर्द-ए-निहाँ की कहानी कहूँगा
मुज़्तर ख़ैराबादी
दम निकल जाएगा रुख़्सत का अभी नाम न लो
मुज़्तर ख़ैराबादी
दम दे दिया है किस रुख़-ए-रौशन की याद में
मुज़्तर ख़ैराबादी
चूकी नज़र जो ज़ाहिद-ए-ख़ाना-ख़राब की
मुज़्तर ख़ैराबादी
चाहत की तमन्ना से कोई आँच न आई
मुज़्तर ख़ैराबादी
बुतों में नूर-ए-ज़ात-ए-किब्रिया मालूम होता है
मुज़्तर ख़ैराबादी
बुत-ख़ाने में क्या याद-ए-इलाही नहीं मुमकिन
मुज़्तर ख़ैराबादी
बुत-कदे में तो तुझे देख लिया करता था
मुज़्तर ख़ैराबादी
बुरा हूँ मैं जो किसी की बुराइयों में नहीं
मुज़्तर ख़ैराबादी
बिछड़ना भी तुम्हारा जीते-जी की मौत है गोया
मुज़्तर ख़ैराबादी
बाज़ू पे रख के सर जो वो कल रात सो गया
मुज़्तर ख़ैराबादी
बाक़ी की मोहब्बत में दिल साफ़ हुआ इतना
मुज़्तर ख़ैराबादी
असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
मुज़्तर ख़ैराबादी
असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
मुज़्तर ख़ैराबादी
अपनी महफ़िल में रक़ीबों को बुलाया उस ने
मुज़्तर ख़ैराबादी
अपने दिल को तिरी आँखों पे फ़िदा करता हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐसी क़िस्मत कहाँ कि जाम आता
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ ख़ुदा दुनिया पे अब क़ब्ज़ा बुतों का चाहिए
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ इश्क़ कहीं ले चल ये दैर-ओ-हरम छूटें
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ हिना रंग-ए-मोहब्बत तो है मुझ में भी निहाँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ बुतो रंज के साथी हो न आराम के तुम
मुज़्तर ख़ैराबादी
अहबाब-ओ-अक़ारिब के बरताव कोई देखे
मुज़्तर ख़ैराबादी
अगर तक़दीर सीधी है तो ख़ुद हो जाओगे सीधे
मुज़्तर ख़ैराबादी
अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है
मुज़्तर ख़ैराबादी