Couplets Poetry (page 259)

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

क़रीब आओ तो शायद समझ में आ जाए

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

मुझ को हालात में उलझा हुआ रहने दे यूँही

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

मेरे माहौल में हर सम्त बुरे लोग नहीं

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

मेरे दामन में अगर कुछ न रहेगा बाक़ी

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

कोई सौग़ात-ए-वफ़ा दे के चला जाऊँगा

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल तो ठहर जाऊँगा

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

अंदाज़-ए-ग़ज़ल आप का क्या ख़ूब है 'रज़्मी'

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

इस शहर का दस्तूर है रिश्तों का भुलाना

मुज़फ़्फ़र इरज

यूँ पलक पर जगमगाना दो घड़ी का ऐश है

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

उस ने मुझ को याद फ़रमाया यक़ीनन

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

सुनता हूँ कि तुझ को भी ज़माने से गिला है

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

सुनाइए वो लतीफ़ा हर एक जाम के साथ

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

सिवाए मेरे किसी को जलने का होश कब था

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

शिकस्त खा चुके हैं हम मगर अज़ीज़ फ़ातेहो

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

रोती हुई एक भीड़ मिरे गिर्द खड़ी थी

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

मुझ से मत बोलो मैं आज भरा बैठा हूँ

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

मेरे तीखे शेर की क़ीमत दुखती रग पर कारी चोट

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

खिलते हैं दिल में फूल तिरी याद के तुफ़ैल

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

काँटों में रख के फूल हवा में उड़ा के ख़ाक

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

जब सराबों पे क़नाअत का सलीक़ा आया

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

बचपन में आकाश को छूता सा लगता था

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

वाह क्या इस गुल-बदन का शोख़ है रंग-ए-बदन

मुज़फ़्फ़र अली असीर

रौनक़ गुलशन जो वो रिंद-ए-शराबी हो गया

मुज़फ़्फ़र अली असीर

नज़्ज़ारा-ए-क़ातिल ने किया महव ये हम को

मुज़फ़्फ़र अली असीर

मग़फ़िरत की नज़र आती है बस इतनी सूरत

मुज़फ़्फ़र अली असीर

काबे चलता हूँ पर इतना तो बता

मुज़फ़्फ़र अली असीर

बाक़ी अभी है तर्क-ए-तमन्ना की आरज़ू

मुज़फ़्फ़र अली असीर

रेत पर इक निशान है शायद

मुज़फ़्फ़र अबदाली

रह-गुज़र का है तक़ाज़ा कि अभी और चलो

मुज़फ़्फ़र अबदाली