Couplets Poetry (page 260)
ख़ुदा भी कैसा हुआ ख़ुश मिरे क़रीने पर
मुज़फ़्फ़र अबदाली
कश्तियाँ लिखती रहें रोज़ कहानी अपनी
मुज़फ़्फ़र अबदाली
बहकना मेरी फ़ितरत में नहीं पर
मुज़फ़्फ़र अबदाली
उतरा था जिस पे बाब-ए-हया का वरक़ वरक़
मुस्तफ़ा ज़ैदी
तितलियाँ उड़ती हैं और उन को पकड़ने वाले
मुस्तफ़ा ज़ैदी
रूह के इस वीराने में तेरी याद ही सब कुछ थी
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नावक-ए-ज़ुल्म उठा दशना-ए-अंदोह सँभाल
मुस्तफ़ा ज़ैदी
मिरी रूह की हक़ीक़त मिरे आँसुओं से पूछो
मुस्तफ़ा ज़ैदी
मैं किस के हाथ पे अपना लहू तलाश करूँ
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ख़ुद अपने शब-ओ-रोज़ गुज़र जाएँगे लेकिन
मुस्तफ़ा ज़ैदी
जिस दिन से अपना तर्ज़-ए-फ़क़ीराना छुट गया
मुस्तफ़ा ज़ैदी
इश्क़ इन ज़ालिमों की दुनिया में
मुस्तफ़ा ज़ैदी
इस तरह होश गँवाना भी कोई बात नहीं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ग़म-ए-दौराँ ने भी सीखे ग़म-ए-जानाँ के चलन
मुस्तफ़ा ज़ैदी
इक मौज-ए-ख़ून-ए-ख़ल्क़ थी किस की जबीं पे थी
मुस्तफ़ा ज़ैदी
दिल के रिश्ते अजीब रिश्ते हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
आँख झुक जाती है जब बंद-ए-क़बा खुलते हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
ज़ेहन में याद के घर टूटने लगते हैं 'शहाब'
मुस्तफ़ा शहाब
सुब्ह तक जाने कहाँ मुझ को उड़ा कर ले जाए
मुस्तफ़ा शहाब
शायद वो भूली-बिसरी न हो आरज़ू कोई
मुस्तफ़ा शहाब
मैं सच से गुरेज़ाँ हूँ और झूट पे नादिम हूँ
मुस्तफ़ा शहाब
मैं भी शायद आप को तन्हा मिलों
मुस्तफ़ा शहाब
मैं और मेरा शौक़-ए-सफ़र साथ हैं मगर
मुस्तफ़ा शहाब
ख़ौफ़ इक बुलंदी से पस्तियों में रुलने का
मुस्तफ़ा शहाब
कार-ए-ज़िंदगानी के शोर-ओ-शर में मुद्दत से
मुस्तफ़ा शहाब
कहा था मैं ने खो कर भी तुझे ज़िंदा रहूँगा
मुस्तफ़ा शहाब
इस्तिआरे ज़मीन से जाएँ
मुस्तफ़ा शहाब
इस तरह सजा रक्खे हैं मैं ने दर-ओ-दीवार
मुस्तफ़ा शहाब
हम में और परिंदों में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है
मुस्तफ़ा शहाब