Couplets Poetry (page 262)
ये क्या सुलूक किया तू ने मुझ से दस्त-ए-जुनूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ये कू-ए-मय-फ़रोश में रौला हुआ कि रात
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ये कब ख़याल में लाते हैं ताज-ए-शाही को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ये गुम हुए हैं ख़याल-ए-विसाल-ए-जानाँ में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
यारान-ए-सुख़न-गो की है वो कंपनी अपनी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
या-रब कभी वो दिन हो कि ख़ल्वत में वो सनम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
यार रोते रहे सब रूह ने परवाज़ किया
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
यार होता है मिरा लाला-अज़ार एक न एक
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
याँ तक किया मैं गिर्या कि ख़ूबाँ के इश्क़ में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
याँ रख़्ना-हा-ए-सीना कुदूरत से हैं फटे
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
यक क़तरा ख़ूँ बग़ल में है दिल मिरी सो इस को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वो जो आशिक़ हैं अपने हाथों से
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वो आप कर रही है मुदाम उस की जुस्तुजू
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वो आहू-ए-रमीदा मिल जाए तीरा-शब गर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वारफ़्ता हूँ ऐसा में कि कूचे में बुताँ के
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वाँ रसाई ही नहीं मजनून-ए-सहरा-गर्द की
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वाँ लाल फड़कता है अमीरों के क़फ़स में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वादों ही पे हर रोज़ मिरी जान न टालो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
वादा-ए-वस्ल दिया ईद की शब हम को सनम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उट्ठा गया फ़लक पे गिरा ख़ाक में मिला
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस्तुख़्वाँ-बंदी-ए-अल्फ़ाज़ का आलम तू देख
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस्ताद कोई ज़ोर मिला क़ैस को शायद
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस ने गाली मुझे दी हो के इताब-आलूदा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस की पड़ी न आँख ख़त-ओ-ख़ाल पर तिरे
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस के मक़्तल में मिरा ख़ून बटा दस्त-ब-दस्त
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस के लहराने में चाल आई न मुतलक़ साँप की
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस के कूचे में सदा मुझ को नज़र आता है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस के कूचे में पुकारेगा अगर मुझ को रक़ीब
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस के दर पर मैं गया साँग बनाए तो कहा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
उस के दहान-ए-तंग में जा-ए-सुख़न नहीं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी