Couplets Poetry (page 263)

उश्शाक़ का कुछ मैं ने आलम ही नया देखा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उस शाहिद-ए-निहाँ का कुश्ता हूँ मैं कि जिस ने

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उस गुल का पता गर नहीं देते हो तो यारो

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उन को भी तिरे इश्क़ ने बे-पर्दा फिराया

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

उम्र सय्याद की गुज़री इसी जासूसी में

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ऊधर गया तू ग़ुस्ल को हम्माम की तरफ़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तुम्हारे सामने क्या 'मुसहफ़ी' पढ़े अशआर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तुम्हारे हाथ को छोड़ूँ हूँ मैं कोई साहिब

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तुझ को ऐ सय्याद काविश ही अगर मंज़ूर है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू ने मुँह फेरा और उस का नूर सा जाता रहा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू मेरे सामने बैठा है आह तिस पर भी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू मेरे दर्द से आगाह यूँ न होवेगा

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू खुले बालों मिरे सामने आया मत कर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू जो जाता है वहीं नित दौड़ दौड़ ऐ 'मुसहफ़ी'

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू जिस के ख़्वाब में आया हो वक़्त-ए-सुब्ह सनम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू हम-दमों से जुदा रह कि टूट जाता है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू गोश-ए-दिल से सुने उस को गर बत-ए-बे-मेहर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तू छोड़ अब तो असीर-ए-क़फ़स को ऐ सय्याद

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तो माइल-ए-उश्शाक़-कुशी है तो यहाँ भी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तीरथ समझ उस को वो गर अश्नान को आवे

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तीन हिस्से हैं ज़मीं के ग़र्क़-ए-दरिया-ए-मुहीत

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तीखे तो हो प सच कहो उस वक़्त क्या करो

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ठठ की ठठ इतनी चली आती है ये काहे को

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तेरी क़सम है अपना तो रुक जाए जी वहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तेरी इस्मत में हमें शक नहीं ऐ माया-ए-नाज़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तेरी ही ज़ात से तो है वाबस्ता ये तिलिस्म

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तेरे कूचे से सफ़र मैं ने किया था जिस दिन

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तिरे कूचे हर बहाने मुझे दिन से रात करना

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तौबा तो की है इश्क़ से पर इस का क्या इलाज

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

तर्रार ज़ुल्फ़-ए-यार अगर चर्ख़ पर चढ़े

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी