Couplets Poetry (page 264)
तारीकी में होता है उसे वस्ल मयस्सर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तरफ़ा आलम है हमारा भी कि हर दम उस से
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तन्हा न वो हाथों की हिना ले गई दिल को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तन तो कहाँ है शोला-ए-फ़ानूस की तरह
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तकलीफ़ न दे हम को तो गुल-गश्त-ए-चमन की
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तदबीर मआश इस जा है शर्त-ए-ख़िरद-मंदी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तड़ावे के लिए है ख़्वान पोश महर-ओ-मह नादाँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ताब-ओ-ताक़त रहे क्या ख़ाक कि आज़ा के तईं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
तब जानूँ मैं कि दीन-ए-मोहम्मद के हैं हरीफ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सुन्नी ओ शीआ के क़ज़िए में है हैराँ मिरी अक़्ल
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सुम्बुल को परेशान किया बाद-ए-सबा ने
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सुल्ह-ए-कुल में मिरी गुज़रे है मोहब्बत के बीच
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सूख कर रह गया है काग़ज़ वार
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सोच दिन रात यही है तिरे दीवाने की
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सीने पे मेरे हर दम रखते हैं हाथ ख़ूबाँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सीने के ज़ोर से भी मू भर नहीं उकसती
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शोख़ी-ए-हुस्न के नज़्ज़ारे की ताक़त है कहाँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शीशा-ए-मय की तरह ऐ साक़ी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शिफ़ा नसीब मिरे क्यूँ के हो कि ऐ यारो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शायद कि किसी और से था वस्ल का वादा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शैख़-उल-हरम मोअज़्ज़िन दोनों चलन के बद हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शैख़ मग़रूर है इस्लाम पे क्या साथ अपने
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शैख़ काबे को तू जा जाऊँ मैं बुत-ख़ाने को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शहवत उन से कौन सी सादिर हुई जो 'मुसहफ़ी'
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शहर में मुझ से भड़कता था तसव्वुर तेरा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शाहिद रहियो तू ऐ शब-ए-हिज्र
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शब-ए-विसाल कब आती है मेरे घर ऐ चर्ख़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शब-ए-हिज्राँ क्या सियाही न हुई रोज़-ए-सफ़ेद
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शब-ए-हिज्र का माजरा कोएले से
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शब तबक़ में आसमाँ के गिर पड़े थे मेरे अश्क
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी