Couplets Poetry (page 266)

रहने पे जो मस्जिद के मिरी शैख़ की बिगड़ी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

रही हमेशा तरक़्क़ी मिरी असीरी को

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

रातों को आँख उठा के ज़रा देख तो सही

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

रात दिन तू है मिरी आग़ोश में

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

रात दिन गर्दिश में है पर हो नहीं सकता हनूज़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़िस्सा-ख़्वाँ बैठे हैं घेरे उस के तईं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़िस्सा-ए-मजनूँ पसंद-ए-ख़ातिर जानाना है

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़िस्मत इक शब ले गई मुझ को जो बाग़-ए-वस्ल में

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़ासिद को उस ने जाते ही रुख़्सत किया था लेक

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़ासिद जो गया मेरा ले नामा तो ज़ालिम ने

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़नाअत उस की निकलती है वाज़्गूनी में

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़लक़-ए-दिल से हैं जैसे मिरे रुख़्सारे ज़र्द

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

क़ैस मिले तो उस से पूछूँ क्या तिरे जी में आई दिवाने

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पीछे फिर फिर देखता जाता हूँ और भागूँ हूँ मैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पीछे पड़ी हैं दिल के बे-तरह मेरी आँखें

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पीछा किसी तरह ये मिरा छोड़ता नहीं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

फिर आई ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल की लहर पेश-ए-नज़र

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पेच दे दे लफ़्ज़ ओ मअनी को बनाते हैं कुलफ़्त

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पाया-ए-तख़्त-ए-सुलैमाँ का है शाएर 'मुसहफ़ी'

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पर्दा-ए-गोश-ए-असीराँ न हुई इक शब-ए-गर्म

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पान खाने की अदा ये है तो इक आलम को

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पलकें नहीं छोड़तीं कि इक दम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पैवस्ता गर्द-ए-दश्त रही गर तह-ए-दरूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पैरहन लूटे मज़े तेरी हम-आग़ोशी के

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

पहना जो मैं ने जामा-ए-दीवानगी तो इश्क़

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

नित जिन आँखों में रहे था तेरी सूरत का ख़याल

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

निस्बत फिर उस से क्या मह-ए-दाग़ी को दीजिए

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ने हाथ मिरा हाथ है ने जेब मिरी जेब

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

नाज़ुक है मेरा शीशा-ए-दिल इस क़दर कि बस

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

नाज़ुक है दिल-ए-यार बहुत चाहिए मुझ को

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी