Couplets Poetry (page 265)
शब में देखी हैं पड़ी पाँव में ज़ंजीरें दो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शब मगर रह गई थोड़ी जो नज़र आता है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जान
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
साया-ए-दीवार जो रोज़-ए-क़यामत में न था
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सौदा है ये किस ज़ुल्फ़ का इस को जो हमेशा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सौ बार गया मैं उस के दर पर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सरक ऐ मौज सलामत तो रह-ए-साहिल ले
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
साक़ी मय-ख़ाना का गर कम-दही पर है मिज़ाज
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सामने उस के लगूँ रोने तो झुँझला के कहे
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
समझ ले आशिक़ ओ माशूक़ की हम-आग़ोशी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सल्तनत और ही माने रखती है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सज्दा-गाह अपनी किए राह के रोड़े पत्थर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सज्दा करता हूँ मैं मेहराब समझ कर उस को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सैल-ए-गिर्या का मैं ममनूँ हूँ कि जिस की दौलत
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सहव और सुक्र में रहते हैं तभी तो फ़ुक़रा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सहराइयान-ए-पूरब क्या जानते हैं इस को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सफ़्फ़ाक इब्तिदा से वो बे-रहम है ग़लत
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सादिक़ से बस इक आन में हो जावे तू काज़िब
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सच इश्क़ में हैं आशिक़ ओ माशूक़ बराबर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
साबित तू रह जफ़ा पे मैं क़ाएम वफ़ा पे हूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
सब उठ्ठे बज़्म से और अपने अपने घर को चले
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
साअत-ए-ईसवियाँ है कि मिरा दिल जिस में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
रुख़ से लहरा कर ज़नख़दाँ के हैं माइल मु-ए-ज़ुल्फ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
रोज़-ए-विसाल जिस को कहती है ख़ल्क़ वो ही
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
रेख़्ता-गोई की बुनियाद 'वली' ने डाली
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
राँझा यही कहता था इधर देखियो मजनूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
रंग-ए-बदन से उस के ये होता जल्वा-गर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
रक्खा है ठौर मुझ को कहरवे के नाच ने
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
रखता है क़दम नाज़ से जिस दम तू ज़मीं पर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी