Couplets Poetry (page 261)
होते होते मैं पहुँच जाता हूँ अपने आप तक
मुस्तफ़ा शहाब
हक़ीक़त को तमाशे से जुदा करने की ख़ातिर
मुस्तफ़ा शहाब
गो तर्क-ए-तअल्लुक़ में भी शामिल हैं कई दुख
मुस्तफ़ा शहाब
दिल सँभाले नहीं सँभलता है
मुस्तफ़ा शहाब
दर कुंज-ए-सदा-बंद का खोलेंगे किसी रोज़
मुस्तफ़ा शहाब
बिखरा बिखरा सा साज़-ओ-सामाँ है
मुस्तफ़ा शहाब
बिछड़ा वो मुझ से ऐसे न बिछड़े कभी कोई
मुस्तफ़ा शहाब
अपनी कश्ती सर पे रख कर चल रहे हैं हम 'शहाब'
मुस्तफ़ा शहाब
ऐसा भी कभी हो मैं जिसे ख़्वाब में देखूँ
मुस्तफ़ा शहाब
लफ़्ज़ जब तक वुज़ू नहीं करते
मुश्ताक़ शाद
हाथ जो खोला तो बच्चा रो पड़ा
मुशताक़ सदफ़
वो सुन सकें कोई उनवाँ इसी लिए हम ने
मुशीर झंझान्वी
मसर्रतों ने तो चाहा था दिल में आ जाएँ
मुशीर झंझान्वी
ये लम्हा लम्हा ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश का हासिल है
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
ये हाल है मिरे दीवार-ओ-दर की वहशत का
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
नज़र चुरा के वो गुज़रा क़रीब से लेकिन
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
मिरी नज़र में गए मौसमों के रंग भी हैं
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
हज़ार बार ख़ुद अपने मकाँ पे दस्तक दी
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
दिल एक और हज़ार आज़माइशें ग़म की
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
बुझे हुए दर-ओ-दीवार देखने वालो
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
ज़ीं-साज़ी अगर आती मुझे मैं तो मिरी जाँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ज़ि-बस ख़ून-ए-ग़लीज़ आँखों से आया
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ज़ि-बस हम को निहायत शौक़ है अमरद-परस्ती का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ज़माने का चलन यकसाँ नहीं कुछ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ज़ालिम ख़ुदा के वास्ते बैठा तो रह ज़रा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ज़ख़्म-ए-शमशीर-ए-निगह हैफ़ कि अच्छा न हुआ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
यूँ है डलक बदन की उस पैरहन की तह में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
यूँ चश्म-ए-तर से चेहरे पर आँसू हुए रवाँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ये ज़माना वो है जिस में हैं बुज़ुर्ग ओ ख़ुर्द जितने
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ये रोज़ ढूँढ लाए है इक ख़ूब-रू नया
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी