Couplets Poetry (page 258)
अब कौन फिरे कू-ए-बुत-ए-दुश्मन-ए-दीं से
मुज़्तर ख़ैराबादी
आशिक़ों की रूह को ता'लीम-ए-वहदत के लिए
मुज़्तर ख़ैराबादी
आप से मुझ को मोहब्बत जो नहीं है न सही
मुज़्तर ख़ैराबादी
आओ तो मेरे आइना-ए-दिल के सामने
मुज़्तर ख़ैराबादी
आँखें न चुराओ दिल में रह कर
मुज़्तर ख़ैराबादी
आइना देख कर ग़ुरूर फ़ुज़ूल
मुज़्तर ख़ैराबादी
आह-ए-रसा ख़ुदा के लिए देख-भाल के
मुज़्तर ख़ैराबादी
संग-रेज़ो को हक़ारत से न ठुकराइए आप
मुज़्तर हैदरी
महफ़िल में उन की खुल गया दिल का मुआमला
मुज़्तर हैदरी
कोई भी शक्ल मुकम्मल किताब बन न सकी
मुज़्तर हैदरी
ख़ुलूस हो तो कहीं बंदगी की क़ैद नहीं
मुज़्तर हैदरी
कल रात मिरे दिल ने फिर चुपके से पूछा है
मुज़्तर हैदरी
झुकी झुकी जो है कड़वी-कसीली नीम की शाख़
मुज़्तर हैदरी
हाए बे-चेहरगी ये इंसाँ की
मुज़्तर हैदरी
इक ठेस भी हल्की सी पत्थर से गिराँ-तर है
मुज़्तर हैदरी
बहुत क़रीब है 'मुज़्तर' वो ज़िंदगी का निज़ाम
मुज़्तर हैदरी
ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ
मुज़फ़्फ़र वारसी
ज़ख़्म-ए-तन्हाई में ख़ुशबू-ए-हिना किस की थी
मुज़फ़्फ़र वारसी
वा'दा मुआवज़े का न करता अगर ख़ुदा
मुज़फ़्फ़र वारसी
तू चले साथ तो आहट भी न आए अपनी
मुज़फ़्फ़र वारसी
साँस लेता हूँ के पत-झड़ सी लगी है मुझ में
मुज़फ़्फ़र वारसी
पहले रग रग से मिरी ख़ून निचोड़ा उस ने
मुज़फ़्फ़र वारसी
मुझे ख़ुद अपनी तलब का नहीं है अंदाज़ा
मुज़फ़्फ़र वारसी
मैं अपने घर में हूँ घर से गए हुओं की तरह
मुज़फ़्फ़र वारसी
लिया जो उस की निगाहों ने जाएज़ा मेरा
मुज़फ़्फ़र वारसी
कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
मुज़फ़्फ़र वारसी
ख़ुद मिरी आँखों से ओझल मेरी हस्ती हो गई
मुज़फ़्फ़र वारसी
जभी तो उम्र से अपनी ज़ियादा लगता हूँ
मुज़फ़्फ़र वारसी
हर शख़्स पर किया न करो इतना ए'तिमाद
मुज़फ़्फ़र वारसी
डुबोने वालों को शर्मिंदा कर चुका हूँगा
मुज़फ़्फ़र वारसी