Couplets Poetry (page 256)

जगाने चुटकियाँ लेने सताने कौन आता है

मुज़्तर ख़ैराबादी

जब उन की पतियाँ बिखरें तो समझे मस्लहत उस की

मुज़्तर ख़ैराबादी

जब मैं ने कहा दिल मिरा पामाल किया क्यूँ

मुज़्तर ख़ैराबादी

जान देना नहीं किसे मंज़ूर

मुज़्तर ख़ैराबादी

जा के अब नार-ए-जहन्नम की ख़बर ले ज़ाहिद

मुज़्तर ख़ैराबादी

इसी को पी के होती है शिफ़ा बीमार-ए-उल्फ़त को

मुज़्तर ख़ैराबादी

इश्क़ का काँटा हमारे दिल में ये कह कर चुभा

मुज़्तर ख़ैराबादी

ईसा से दवा-ए-मरज़-ए-इश्क़ न होगी

मुज़्तर ख़ैराबादी

ईसा कभी न जाते लेकिन तुम्हारे ग़म में

मुज़्तर ख़ैराबादी

इस से पहले मैं कभी आबाद घर बस्ती में था

मुज़्तर ख़ैराबादी

इन बुतों की ही मोहब्बत से ख़ुदा मिलता है

मुज़्तर ख़ैराबादी

ईमान साथ जाएगा क्यूँकर ख़ुदा के घर

मुज़्तर ख़ैराबादी

इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता

मुज़्तर ख़ैराबादी

इकट्ठे कर के तेरी दूसरी तस्वीर खींचूँगा

मुज़्तर ख़ैराबादी

हम से अच्छा नहीं मिलने का अगर तुम चाहो

मुज़्तर ख़ैराबादी

हज़ारों हुस्न वाले इस ज़मीं में दफ़न हैं 'मुज़्तर'

मुज़्तर ख़ैराबादी

हस्ती-ए-ग़ैर का सज्दा है मोहब्बत में गुनाह

मुज़्तर ख़ैराबादी

हसरतों को कोई कहाँ रक्खे

मुज़्तर ख़ैराबादी

हसीनों पर नहीं मरता मैं इस हसरत में मरता हूँ

मुज़्तर ख़ैराबादी

हमारे मय-कदे में ख़ैर से हर चीज़ रहती है

मुज़्तर ख़ैराबादी

हमारे एक दिल को उन की दो ज़ुल्फ़ों ने घेरा है

मुज़्तर ख़ैराबादी

हाल-ए-दिल अग़्यार से कहना पड़ा

मुज़्तर ख़ैराबादी

हाल ज़ाहिद जो मय-ए-नाब का पूछे तो कहूँ

मुज़्तर ख़ैराबादी

हाल उस ने हमारा पूछा है

मुज़्तर ख़ैराबादी

गए हम दैर से काबे मगर ये कह के फिर आए

मुज़्तर ख़ैराबादी

फ़ना के बा'द इस दुनिया में कुछ बाक़ी नहीं रहता

मुज़्तर ख़ैराबादी

इक सदमा-ए-मोहब्बत इक सदमा-ए-जुदाई

मुज़्तर ख़ैराबादी

इक हम कि हम को सुब्ह से है शाम की ख़ुशी

मुज़्तर ख़ैराबादी

एक हम हैं कि जहाँ जाएँ बुरे कहलाएँ

मुज़्तर ख़ैराबादी

इक हम हैं कि हम ने तुम्हें माशूक़ बनाया

मुज़्तर ख़ैराबादी