Couplets Poetry (page 253)

तेरे घर आएँ तो ईमान को किस पर छोड़ें

मुज़्तर ख़ैराबादी

तसव्वुर में तिरा दर अपने सर तक खींच लेता हूँ

मुज़्तर ख़ैराबादी

तसव्वुर ख़ाना-आबादी करेगा

मुज़्तर ख़ैराबादी

तरीक़ याद है पहले से दिल लगाने का

मुज़्तर ख़ैराबादी

तरीक़ याद है पहले से दिल लगाने का

मुज़्तर ख़ैराबादी

तमन्ना इक तरह की जान है जो मरते दम निकले

मुज़्तर ख़ैराबादी

तड़प ही तड़प रह गई सिर्फ़ बाक़ी

मुज़्तर ख़ैराबादी

सूरत तो एक ही थी दो घर हुए तो क्या है

मुज़्तर ख़ैराबादी

सुनोगे हाल जो मेरा तो दाद क्या दोगे

मुज़्तर ख़ैराबादी

सुब्ह तक कौन जियेगा शब-ए-तन्हाई में

मुज़्तर ख़ैराबादी

साक़ी वो ख़ास तौर की ता'लीम दे मुझे

मुज़्तर ख़ैराबादी

साक़ी तिरी नज़र तो क़यामत सी ढा गई

मुज़्तर ख़ैराबादी

साक़ी ने लगी दिल की इस तरह बुझा दी थी

मुज़्तर ख़ैराबादी

साक़ी मिरा खिंचा था तो मैं ने मना लिया

मुज़्तर ख़ैराबादी

सदमा बुत-ए-काफ़िर की मोहब्बत का न पूछो

मुज़्तर ख़ैराबादी

रूह देती रही तर्ग़ीब-ए-तअ'ल्ली बरसों

मुज़्तर ख़ैराबादी

रंज-ए-ग़ुर्बत में देख कर मुझ को

मुज़्तर ख़ैराबादी

क़िबला बन जाए जहाँ तू कोई पत्थर रख दे

मुज़्तर ख़ैराबादी

क़यामत में बड़ी गर्मी पड़ेगी हज़रत-ए-ज़ाहिद

मुज़्तर ख़ैराबादी

क़ासिद ने ख़बर आमद-ए-दिलबर की उड़ा दी

मुज़्तर ख़ैराबादी

क़ैस ने पर्दा-ए-महमिल को जो देखा तो कहा

मुज़्तर ख़ैराबादी

क़ब्र पर क्या हुआ जो मेला है

मुज़्तर ख़ैराबादी

फूंके देता है किसी का सोज़-ए-पिन्हानी मुझे

मुज़्तर ख़ैराबादी

पर्दे वाले भी कहीं आते हैं घर से बाहर

मुज़्तर ख़ैराबादी

पहले हम में थे और अब हम से जुदा रहते हैं

मुज़्तर ख़ैराबादी

पड़ा हूँ इस तरह उस दर पे 'मुज़्तर'

मुज़्तर ख़ैराबादी

पड़ गए ज़ुल्फ़ों के फंदे और भी

मुज़्तर ख़ैराबादी

निगाहों में फिरती है आठों-पहर

मुज़्तर ख़ैराबादी

निगाह-ए-यार मिल जाती तो हम शागिर्द हो जाते

मुज़्तर ख़ैराबादी

निछावर बुत-कदे पर दिल करूँ का'बा तो कोसों है

मुज़्तर ख़ैराबादी