Couplets Poetry (page 356)

वो एक शख़्स कि गुमनाम था ख़ुदाई में

हमीद कौसर

वही देखूँ जिसे देखा न जाए

हमीद कौसर

आज इंसाँ ने भुला डाले हैं यज़्दाँ के करम

हमीद जाज़िब

उन की जफ़ाओं पर भी वफ़ा का हुआ गुमाँ

हमीद जालंधरी

सीने में राज़-ए-इश्क़ छुपाया न जाएगा

हमीद जालंधरी

फिर गई इक और ही दुनिया नज़र के सामने

हमीद जालंधरी

किस शान से गए हैं शहीदान-ए-कू-ए-यार

हमीद जालंधरी

हुई मुद्दत कि उन को ख़्वाब में भी अब नहीं देखा

हमीद जालंधरी

भूली नहीं उजड़े हुए गुलशन की बहारें

हमीद जालंधरी

आने लगे हैं वो भी अयादत के वास्ते

हमीद जालंधरी

शजर-ए-तर न यहाँ बर्ग-ए-शनासा कोई

हमीद अलमास

बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग

हमदम कशमीरी

कोई इल्ज़ाम कोई तंज़ कोई रुस्वाई

हलीम कुरेशी

अब तुझे कैसे बताएँ कि तिरी यादों में

हलीम कुरेशी

आगे जो क़दम रक्खा पीछे का न ग़म रक्खा

हलीम कुरेशी

वो सर ही क्या कि जिस में तुम्हारा न हो ख़याल

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

तअस्सुब बर-तरफ़ मस्जिद हो या हो कू-ए-बुत-ख़ाना

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

रुख़्सार पर है रंग-ए-हया का फ़रोग़ आज

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

मय न हो बू ही सही कुछ तो हो रिंदों के लिए

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

दुनिया बस इस से और ज़ियादा नहीं है कुछ

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

चर्चा हमारा इश्क़ ने क्यूँ जा-ब-जा किया

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

भला तू और घर आए मिरे क्यूँ-कर यक़ीं कर लूँ

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

ये तमाशा भी अजब है उन के उठ जाने के बाद

हकीम नासिर

ये दर्द है हमदम उसी ज़ालिम की निशानी

हकीम नासिर

वो मुझे छोड़ के इक शाम गए थे 'नासिर'

हकीम नासिर

वो जो कहता था कि 'नासिर' के लिए जीता हूँ

हकीम नासिर

उस के दिल पर भी कड़ी इश्क़ में गुज़री होगी

हकीम नासिर

तुम्हारे बाद उजाले भी हो गए रुख़्सत

हकीम नासिर

पत्थरो आज मिरे सर पे बरसते क्यूँ हो

हकीम नासिर