Couplets Poetry (page 354)
कुश्ता-ए-ज़बत-ए-फुग़ाँ नग़्मा-ए-बे-साज़-ओ-सदा
हनीफ़ अख़गर
कोई साग़र पे साग़र पी रहा है कोई तिश्ना है
हनीफ़ अख़गर
किसी के जौर-ए-मुसलसल का फ़ैज़ है 'अख़्गर'
हनीफ़ अख़गर
ख़ल्वत-ए-जाँ में तिरा दर्द बसाना चाहे
हनीफ़ अख़गर
काफ़िर सही हज़ार मगर इस को क्या कहें
हनीफ़ अख़गर
जो मुसाफ़िर भी तिरे कूचे से गुज़रा होगा
हनीफ़ अख़गर
जो कुशूद-ए-कार-ए-तिलिस्म है वो फ़क़त हमारा ही इस्म है
हनीफ़ अख़गर
जो है ताज़गी मिरी ज़ात में वही ज़िक्र-ओ-फ़िक्र-ए-चमन में है
हनीफ़ अख़गर
जब भी उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की हवा आती है
हनीफ़ अख़गर
इज़हार पे भारी है ख़मोशी का तकल्लुम
हनीफ़ अख़गर
इश्क़ में दिल का ये मंज़र देखा
हनीफ़ अख़गर
हसीन सूरत हमें हमेशा हसीं ही मालूम क्यूँ न होती
हनीफ़ अख़गर
हर-चंद हमा-गीर नहीं ज़ौक़-ए-असीरी
हनीफ़ अख़गर
हर तरफ़ हैं ख़ाना-बर्बादी के मंज़र बे-शुमार
हनीफ़ अख़गर
फ़ुक़दान-ए-उरूज-ए-रसन-ओ-दार नहीं है
हनीफ़ अख़गर
देखो हमारी सम्त कि ज़िंदा हैं हम अभी
हनीफ़ अख़गर
देखिए रुस्वा न हो जाए कहीं कार-ए-जुनूँ
हनीफ़ अख़गर
बे-शक असीर-ए-गेसू-ए-जानाँ हैं बे-शुमार
हनीफ़ अख़गर
बज़्म को रंग-ए-सुख़न मैं ने दिया है 'अख़्गर'
हनीफ़ अख़गर
अजब है आलम अजब है मंज़र कि सकता में है ये चश्म-ए-हैरत
हनीफ़ अख़गर
आँखों में जल रहे थे दिए ए'तिबार के
हनीफ़ अख़गर
आइने में है फ़क़त आप का अक्स
हनीफ़ अख़गर
उम्र की अव्वलीं अज़ानों में
हम्माद नियाज़ी
सुन क़तार अंदर क़तार अश्जार की सरगोशियाँ
हम्माद नियाज़ी
सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
हम्माद नियाज़ी
रोज़ मैं उस को जीत जाता था
हम्माद नियाज़ी
पूछता फिरता हूँ गलियों में कोई है कोई है
हम्माद नियाज़ी
पेड़ उजड़ते जाते हैं
हम्माद नियाज़ी
कच्ची क़ब्रों पर सजी ख़ुशबू की बिखरी लाश पर
हम्माद नियाज़ी
कब मुझे उस ने इख़्तियार दिया
हम्माद नियाज़ी