Couplets Poetry (page 352)

हाँ वो दिन याद हैं जब हम भी कहा करते थे

हरी चंद अख़्तर

हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से काम कुछ यानी

हरी चंद अख़्तर

भरोसा किस क़दर है तुझ को 'अख़्तर' उस की रहमत पर

हरी चंद अख़्तर

अगर तेरी ख़ुशी है तेरे बंदों की मसर्रत में

हरी चंद अख़्तर

यक-ब-यक तर्क न करना था मोहब्बत मुझ से

हक़ीर

या उस से जवाब-ए-ख़त लाना या क़ासिद इतना कह देना

हक़ीर

टूटें वो सर जिस में तेरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं

हक़ीर

थोड़ी तकलीफ़ सही आने में

हक़ीर

साक़िया ऐसा पिला दे मय का मुझ को जाम तल्ख़

हक़ीर

मुझे अब मौत बेहतर ज़िंदगी से

हक़ीर

क्यूँ न का'बे को कहूँ अल्लाह का और बुत का घर

हक़ीर

क्या जानें उन की चाल में एजाज़ है कि सेहर

हक़ीर

की किसी पर न जफ़ा मेरे बा'द

हक़ीर

खुली जो आँख मिरी सामना क़ज़ा से हुआ

हक़ीर

ख़ूब मिल कर गले से रो लेना

हक़ीर

जब से कुछ क़ाबू है अपना काकुल-ए-ख़मदार पर

हक़ीर

जानता उस को हूँ दवा की तरह

हक़ीर

इश्क़ के फंदे से बचिए ऐ 'हक़ीर'-ए-ख़स्ता-दिल

हक़ीर

हक़ारत की निगाहों से न फ़र्श-ए-ख़ाक को देखो

हक़ीर

देखा बग़ौर ऐब से ख़ाली नहीं कोई

हक़ीर

छा गई एक मुसीबत की घटा चार तरफ़

हक़ीर

चार दिन की बहार है सारी

हक़ीर

बुत-कदे में भी गया का'बे की जानिब भी गया

हक़ीर

बुत को पूजूँगा सनम-ख़ानों में जा जा के तो मैं

हक़ीर

बंद-ए-क़बा पे हाथ है शरमाए जाते हैं

हक़ीर

ब-ख़ुदा सज्दे करेगा वो बिठा कर बुत को

हक़ीर

तोड़ कर निकले क़फ़स तो गुम थी राह-ए-आशियाँ

हेंसन रेहानी

हर ज़र्रा है जमाल की दुनिया लिए हुए

हेंसन रेहानी

ग़म की तकमील का सामान हुआ है पैदा

हेंसन रेहानी

रिश्ते नाते टूटे फूटे लगे हैं

हनीफ़ तरीन