Couplets Poetry (page 350)

वफ़ा परछाईं की अंधी परस्तिश

हसन अकबर कमाल

पाया जब से ज़ख़्म किसी को खोने का

हसन अकबर कमाल

न टूटे और कुछ दिन तुझ से रिश्ता इस तरह मेरा

हसन अकबर कमाल

क्या तर्जुमानी-ए-ग़म-ए-दुनिया करें कि जब

हसन अकबर कमाल

कल यही बच्चे समुंदर को मुक़ाबिल पाएँगे

हसन अकबर कमाल

गए दिनों में रोना भी तो कितना सच्चा था

हसन अकबर कमाल

एक दिया कब रोक सका है रात को आने से

हसन अकबर कमाल

दिए बुझाती रही दिल बुझा सके तो बुझाए

हसन अकबर कमाल

दिल में तिरे ख़ुलूस समोया न जा सका

हसन अकबर कमाल

बनाए जाता था मैं अपने हाथ को कश्कोल

हसन अकबर कमाल

बड़ों ने उस को छीन लिया है बच्चों से

हसन अकबर कमाल

याद-ए-याराँ दिल में आई हूक बन कर रह गई

हसन आबिदी

तिश्ना-कामों को यहाँ कौन सुबू देता है

हसन आबिदी

शहर-ए-ना-पुरसाँ में कुछ अपना पता मिलता नहीं

हसन आबिदी

सब उम्मीदें मिरे आशोब-ए-तमन्ना तक थीं

हसन आबिदी

कुछ न कुछ तो होता है इक तिरे न होने से

हसन आबिदी

दुनिया कहाँ थी पास-ए-विरासत के ज़िम्न में

हसन आबिदी

दिल की दहलीज़ पे जब शाम का साया उतरा

हसन आबिदी

अश्कों में पिरो के उस की यादें

हसन आबिदी

ऐ ख़ुदा इंसान की तक़्सीम-दर-तक़्सीम देख

हसन आबिदी

वो ब'अद-ए-मुद्दत मिला तो रोने की आरज़ू में

हसन अब्बासी

उस अजनबी से हाथ मिलाने के वास्ते

हसन अब्बासी

निस्बतें थीं रेत से कुछ इस क़दर

हसन अब्बासी

मुझ को मालूम था इक रोज़ चला जाएगा!

हसन अब्बासी

मोहब्बत में कठिन रस्ते बहुत आसान लगते थे

हसन अब्बासी

ख़फ़ा हो मुझ से तो अपने अंदर

हसन अब्बासी

कभी जो आँखों के आ गया आफ़्ताब आगे

हसन अब्बासी

हसीन यादों के चाँद को अलविदा'अ कह कर

हसन अब्बासी

इक परिंदे की तरह उड़ गया कुछ देर हुई

हसन अब्बासी

आज तेरी याद से टकरा के टुकड़े हो गया

हसन अब्बासी