Couplets Poetry (page 351)

ये कार-ए-इश्क़ तो बच्चों का खेल ठहरा है

हसन अब्बास रज़ा

उस का फ़िराक़ इतना बड़ा सानेहा न था

हसन अब्बास रज़ा

तुझ से बिछड़ के सम्त-ए-सफ़र भूलने लगे

हसन अब्बास रज़ा

तअल्लुक़ तोड़ने में पहल मुश्किल मरहला था

हसन अब्बास रज़ा

सिवा तेरे हर इक शय को हटा देना है मंज़र से

हसन अब्बास रज़ा

शाम-ए-विदाअ थी मगर उस रंग-बाज़ ने

हसन अब्बास रज़ा

सवाल ये नहीं मुझ से है क्यूँ गुरेज़ाँ वो

हसन अब्बास रज़ा

मोहब्बतें तो फ़क़त इंतिहाएँ माँगती हैं

हसन अब्बास रज़ा

मकीं यहीं का है लेकिन मकाँ से बाहर है

हसन अब्बास रज़ा

मैं तर्क-ए-तअल्लुक़ पे भी आमादा हूँ लेकिन

हसन अब्बास रज़ा

मैं फिर इक ख़त तिरे आँगन गिराना चाहता हूँ

हसन अब्बास रज़ा

क्या शख़्स था उड़ाता रहा उम्र भर मुझे

हसन अब्बास रज़ा

किस को थी ख़बर इस में तड़ख़ जाएगा दिल भी

हसन अब्बास रज़ा

जुदाई की रुतों में सूरतें धुँदलाने लगती हैं

हसन अब्बास रज़ा

इरादा था कि अब के रंग-ए-दुनिया देखना है

हसन अब्बास रज़ा

हमेशा इक मसाफ़त घूमती रहती है पाँव में

हसन अब्बास रज़ा

हमारी जेब में ख़्वाबों की रेज़गारी है

हसन अब्बास रज़ा

धड़कती क़ुर्बतों के ख़्वाब से जागे तो जाना

हसन अब्बास रज़ा

आँखों से ख़्वाब दिल से तमन्ना तमाम-शुद

हसन अब्बास रज़ा

यही होता है कि तदबीर को नाकाम करे

हरी चंद अख़्तर

उन्हें देखा तो ज़ाहिद ने कहा ईमान की ये है

हरी चंद अख़्तर

शैख़ ओ पंडित धर्म और इस्लाम की बातें करें

हरी चंद अख़्तर

शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आया

हरी चंद अख़्तर

रहे दो दो फ़रिश्ते साथ अब इंसाफ़ क्या होगा

हरी चंद अख़्तर

नेमतों को देखता है और हँस देता है दिल

हरी चंद अख़्तर

मुझ को देखा फूट के रोया

हरी चंद अख़्तर

मिलेगी शैख़ को जन्नत हमें दोज़ख़ अता होगी

हरी चंद अख़्तर

जो ठोकर ही नहीं खाते वो सब कुछ हैं मगर वाइज़

हरी चंद अख़्तर

जिन्हें हासिल है तेरा क़ुर्ब ख़ुश-क़िस्मत सही लेकिन

हरी चंद अख़्तर

जम्अ हैं सारे मुसाफ़िर ना-ख़ुदा-ए-दिल के पास

हरी चंद अख़्तर