Couplets Poetry (page 353)

रेत पर जलते हुए देख सराबों के चराग़

हनीफ़ तरीन

पानी ने जिसे धूप की मिट्टी से बनाया

हनीफ़ तरीन

महफ़िल में फूल ख़ुशियों के जो बाँटता रहा

हनीफ़ तरीन

जिन का यक़ीन राह-ए-सुकूँ की असास है

हनीफ़ तरीन

हर ज़ख़्म-ए-कोहना वक़्त के मरहम ने भर दिया

हनीफ़ तरीन

बस्ती के हस्सास दिलों को चुभता है

हनीफ़ तरीन

तोड़ डालें हम निज़ाम-ए-ख़स्तगी

हनीफ़ फ़ौक़

पत्थरों से कब तलक बाँधेगी उम्मीद-ए-वफ़ा

हनीफ़ साजिद

इंक़लाब-ए-सुब्ह की कुछ कम नहीं ये भी दलील

हनीफ़ साजिद

वो इक जगह न कहीं रह सका और उस के साथ

हनीफ़ नज्मी

अगर जहाँ में कोई आइना नहीं तेरा

हनीफ़ नज्मी

तमाम आलम से मोड़ कर मुँह मैं अपने अंदर समा गया हूँ

हनीफ़ कैफ़ी

शब-ए-दराज़ का है क़िस्सा मुख़्तसर 'कैफ़ी'

हनीफ़ कैफ़ी

सब नज़र आते हैं चेहरे गर्द गर्द

हनीफ़ कैफ़ी

मुद्दतें गुज़रीं मुलाक़ात हुई थी तुम से

हनीफ़ कैफ़ी

मिले वो लम्हा जिसे अपना कह सकें 'कैफ़ी'

हनीफ़ कैफ़ी

कोई भी रुत हो मिली है दुखों की फ़स्ल हमें

हनीफ़ कैफ़ी

अपनी जानिब नहीं अब लौटना मुमकिन मेरा

हनीफ़ कैफ़ी

अपने काँधों पे लिए फिरता हूँ अपनी ही सलीब

हनीफ़ कैफ़ी

अना अना के मुक़ाबिल है राह कैसे खुले

हनीफ़ कैफ़ी

ये सानेहा भी बड़ा अजब है कि अपने ऐवान-ए-रंग-ओ-बू में

हनीफ़ अख़गर

याद-ए-फ़रोग़-ए-दस्त-ए-हिनाई न पूछिए

हनीफ़ अख़गर

वो कम-सिनी में भी 'अख़्गर' हसीन था लेकिन

हनीफ़ अख़गर

तुम्हारी आँखों की गर्दिशों में बड़ी मुरव्वत है हम ने माना

हनीफ़ अख़गर

शामिल हुए हैं बज़्म में मिस्ल-ए-चराग़ हम

हनीफ़ अख़गर

शदीद तुंद हवाएँ हैं क्या किया जाए

हनीफ़ अख़गर

पूछती रहती है जो क़ैसर-ओ-किसरा का मिज़ाज

हनीफ़ अख़गर

पल-भर न बिजलियों के मुक़ाबिल ठहर सके

हनीफ़ अख़गर

निगाहें फेरने वाले ये नज़रें उठ ही जाती हैं

हनीफ़ अख़गर

लोग मिलने को चले आते हैं दीवाने से

हनीफ़ अख़गर