Couplets Poetry (page 348)
मैं अपनी रूह में उस को बसा चुका इतना
हसन नईम
क्या फ़िराक़ ओ फ़ैज़ से लेना था मुझ को ऐ 'नईम'
हसन नईम
कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे
हसन नईम
कोई मौसम हो यही सोच के जी लेते हैं
हसन नईम
किसी ने डूबती सुब्हों तड़पती शामों को
हसन नईम
ख़ल्वत-ए-उम्मीद में रौशन है अब तक वो चराग़
हसन नईम
ख़ैर से दिल को तिरी याद से कुछ काम तो है
हसन नईम
कम नहीं ऐ दिल-ए-बेताब मता-ए-उम्मीद
हसन नईम
जुरअत कहाँ कि अपना पता तक बता सकूँ
हसन नईम
जो मेरे दश्त-ए-जुनूँ में था फ़र्क़-ए-रू-ए-बहार
हसन नईम
जो भी कहना है कहो साफ़ शिकायत ही सही
हसन नईम
जहाँ दिखाई न देता था एक टीला भी
हसन नईम
इतना रोया हूँ ग़म-ए-दोस्त ज़रा सा हँस कर
हसन नईम
'इक़बाल' की नवा से मुशर्रफ़ है गो 'नईम'
हसन नईम
ग़म से बिखरा न पाएमाल हुआ
हसन नईम
गर्द-ए-शोहरत को भी दामन से लिपटने न दिया
हसन नईम
एक दरिया पार कर के आ गया हूँ उस के पास
हसन नईम
ऐ सबा मैं भी था आशुफ़्ता-सरों में यकता
हसन नईम
आ बसे कितने नए लोग मकान-ए-जाँ में
हसन नईम
वो चाँद जो उतरा है किसी और के घर में
हसन नासिर
क्या ख़बर कब लौट आएँ अजनबी देसों से वो
हसन नासिर
दरख़्त कट गया लेकिन वो राब्ते 'नासिर'
हसन नासिर
अब आइना भी मिज़ाजों की बात करता है
हसन नासिर
शहर की भीड़ में शामिल है अकेला-पन भी
हसन नज्मी सिकन्दरपुरी
मौसम का ज़ुल्म सहते हैं किस ख़ामुशी के साथ
हसन नज्मी सिकन्दरपुरी
माँगो समुंदरों से न साहिल की भीक तुम
हसन नज्मी सिकन्दरपुरी
हम को इस की क्या ख़बर गुलशन का गुलशन जल गया
हसन नज्मी सिकन्दरपुरी
ज़िंदगी भर दर-ओ-दीवार सजाए जाएँ
हसन जमील
ये रौशनी यूँही आग़ोश में नहीं आती
हसन जमील
मालूम हुआ कैसे ख़िज़ाँ आती है गुल पर
हसन जमील