Couplets Poetry (page 346)

ता-अबद ख़ाली रहे या-रब दिलों में उस की जा

हसरत अज़ीमाबादी

सौगंद है हसरत मुझे एजाज़-ए-सुख़न की

हसरत अज़ीमाबादी

साक़िया पैहम पिला दे मुझ को माला-माल जाम

हसरत अज़ीमाबादी

सज्दा-गाह-ए-बरहमन और शैख़ हैं दैर-ओ-हरम

हसरत अज़ीमाबादी

रहे है नक़्श मेरे चश्म-ओ-दिल पर यूँ तिरी सूरत

हसरत अज़ीमाबादी

निभे थी आन उन्हों की हमेशा इश्क़ में ख़ूब

हसरत अज़ीमाबादी

ना-ख़लफ़ बस-कि उठी इश्क़ ओ जुनूँ की औलाद

हसरत अज़ीमाबादी

मोहब्बत एक तरह की निरी समाजत है

हसरत अज़ीमाबादी

मत हलाक इतना करो मुझ को मलामत कर कर

हसरत अज़ीमाबादी

माख़ूज़ होगे शैख़-ए-रिया-कार रोज़-ए-हश्र

हसरत अज़ीमाबादी

मैं 'हसरत' मुज्तहिद हूँ बुत-परस्ती की तरीक़त का

हसरत अज़ीमाबादी

मय-कशी में रखते हैं हम मशरब-ए-दुर्द-ए-शराब

हसरत अज़ीमाबादी

खेलें आपस में परी-चेहरा जहाँ ज़ुल्फ़ें खोल

हसरत अज़ीमाबादी

काफ़िर-ए-इश्क़ हूँ ऐ शैख़ पे ज़िन्हार नहीं

हसरत अज़ीमाबादी

इश्क़ में ख़्वाब का ख़याल किसे

हसरत अज़ीमाबादी

इस जहाँ में सिफ़त-ए-इश्क़ से मौसूफ़ हैं हम

हसरत अज़ीमाबादी

हम न जानें किस तरफ़ काबा है और कीधर है दैर

हसरत अज़ीमाबादी

हक़ अदा करना मोहब्बत का बहुत दुश्वार है

हसरत अज़ीमाबादी

गुल कभू हम को दिखाती है कभी सर्व-ओ-समन

हसरत अज़ीमाबादी

दुनिया का व दीं का हम को क्या होश

हसरत अज़ीमाबादी

बुरा न माने तो इक बात पूछता हूँ मैं

हसरत अज़ीमाबादी

भर के नज़र यार न देखा कभी

हसरत अज़ीमाबादी

लफ़्ज़ों के हेर-फेर से बनती नहीं ग़ज़ल

हसनैन आक़िब

ख़ुद को कभी मैं पा न सका

हसनैन आक़िब

कटती है शब विसाल की पलकें झपकते ही

हसनैन आक़िब

जी चाहता है तर्क-ए-मोहब्बत को बार बार

हसनैन आक़िब

ग़म उठाता हूँ ग़ज़ल कहता हूँ जीता रहता हूँ

हसनैन आक़िब

गरचे हल्का सा धुँदलका है तसव्वुर भी तिरा

हसनैन आक़िब

बहुत उदास हैं दीवारें ऊँचे महलों की

हसनैन आक़िब

और थोड़ा सा बिखर जाऊँ यही ठानी है

हसनैन आक़िब