Couplets Poetry (page 347)
सारी रुस्वाई ज़माने की गवारा कर के
हाशिम रज़ा जलालपुरी
महफ़िल में लोग चौंक पड़े मेरे नाम पर
हाशिम रज़ा जलालपुरी
हम से आबाद है ये शेर-ओ-सुख़न की महफ़िल
हाशिम रज़ा जलालपुरी
हम बे-नियाज़ बैठे हुए उन की बज़्म में
हाशिम रज़ा जलालपुरी
गरेबाँ चाक, धुआँ, जाम, हाथ में सिगरेट
हाशिम रज़ा जलालपुरी
इसी उम्मीद पर तो जी रहे हैं हिज्र के मारे
हाशिम अली ख़ाँ दिलाज़ाक
ये इंतिक़ाम है या एहतिजाज है क्या है
हसीब सोज़
ये बद-नसीबी नहीं है तो और फिर क्या है
हसीब सोज़
यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है
हसीब सोज़
वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया
हसीब सोज़
तू एक साल में इक साँस भी न जी पाया
हसीब सोज़
तेरे मेहमाँ के स्वागत का कोई फूल थे हम
हसीब सोज़
मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को
हसीब सोज़
दर-ओ-दीवार भी घर के बहुत मायूस थे हम से
हसीब सोज़
यहाँ न मैं हूँ न तू है न कोई शहनाई
हसन ताहिर
ग़म-ए-हयात ने फ़ुर्सत न दी सुनाने की
हसन ताहिर
ये उस के प्यार की बातें फ़क़त क़िस्से पुराने हैं
हसन रिज़वी
था जो एक लम्हा विसाल का वो रियाज़ था कई साल का
हसन रिज़वी
न वो इक़रार करता है न वो इंकार करता है
हसन रिज़वी
कभी किताबों में फूल रखना कभी दरख़्तों पे नाम लिखना
हसन रिज़वी
अब उस से बढ़ के भला मो'तबर कहें किस को
हसन रिज़वी
सरा-ए-दिल में जगह दे तो काट लूँ इक रात
हसन नईम
सच तो ये कि अभी दिल को सुकूँ है लेकिन
हसन नईम
रूह का लम्बा सफ़र है एक भी इंसाँ का क़ुर्ब
हसन नईम
पयम्बरों ने कहा था कि झूट हारेगा
हसन नईम
पाँव से लग के खड़ी है ये ग़रीब-उल-वतनी
हसन नईम
पय-ब-पय तलवार चलती है यहाँ आफ़ात की
हसन नईम
पय-ब-पय तलवार चलती है यहाँ आफ़ात की
हसन नईम
मौजा-ए-अश्क से भीगी न कभी नोक-ए-क़लम
हसन नईम
मैं एक बाब था अफ़साना-ए-वफ़ा का मगर
हसन नईम