Couplets Poetry (page 357)
मय-कशी गर्दिश-ए-अय्याम से आगे न बढ़ी
हकीम नासिर
जिस ने भी मुझे देखा है पत्थर से नवाज़ा
हकीम नासिर
जब से तू ने मुझे दीवाना बना रक्खा है
हकीम नासिर
घर में जो इक चराग़ था तुम ने उसे बुझा दिया
हकीम नासिर
दो घड़ी दर्द ने आँखों में भी रहने न दिया
हकीम नासिर
आसान किस क़दर है समझ लो मिरा पता
हकीम नासिर
आप क्या आए कि रुख़्सत सब अंधेरे हो गए
हकीम नासिर
तुझ पे खुल जाएँगे ख़ुद अपने भी असरार कई
हकीम मंज़ूर
तेरी आँखों में आँसू भी देखे हैं
हकीम मंज़ूर
शहर के आईन में ये मद भी लिक्खी जाएगी
हकीम मंज़ूर
रेज़ा रेज़ा रात भर जो ख़ौफ़ से होता रहा
हकीम मंज़ूर
न जाने किस लिए रोता हूँ हँसते हँसते मैं
हकीम मंज़ूर
मुझ में थे जितने ऐब वो मेरे क़लम ने लिख दिए
हकीम मंज़ूर
जो मेरे पास था सब लूट ले गया कोई
हकीम मंज़ूर
इतना बदल गया हूँ कि पहचानने मुझे
हकीम मंज़ूर
हम किसी बहरूपिए को जान लें मुश्किल नहीं
हकीम मंज़ूर
हर एक आँख को कुछ टूटे ख़्वाब दे के गया
हकीम मंज़ूर
गिरेगी कल भी यही धूप और यही शबनम
हकीम मंज़ूर
देखते हैं दर-ओ-दीवार हरीफ़ाना मुझे
हकीम मंज़ूर
छोड़ कर बार-ए-सदा वो बे-सदा हो जाएगा
हकीम मंज़ूर
बाग़ में होना ही शायद सेब की पहचान थी
हकीम मंज़ूर
अपनी नज़र से टूट कर अपनी नज़र में गुम हुआ
हकीम मंज़ूर
अगरचे उस की हर इक बात खुरदुरी है बहुत
हकीम मंज़ूर
नक़्श-ए-पा-ए-यार को चूमूँ तो आख़िर किस तरह
हाजी लक़ लक़
क्या मालूम किसी की मुश्किल
हैरत शिमलवी
जो चल पड़े थे अज़्म-ए-सफ़र ले के थक गए
हैरत सहरवर्दी
रह रह के कौंदती हैं अंधेरे में बिजलियाँ
हैरत गोंडवी
मुझे ऐ रहनुमा अब छोड़ तन्हा
हैरत गोंडवी
कुछ मिरी बे-क़रारियाँ कुछ मिरी ना-तवानियाँ
हैरत गोंडवी
हुस्न है काफ़िर बनाने के लिए
हैरत गोंडवी