Hope Poetry (page 194)

कुछ और तरह की मुश्किल में डालने के लिए

आफ़ताब हुसैन

करता कुछ और है वो दिखाता कुछ और है

आफ़ताब हुसैन

कब भटक जाए 'आफ़्ताब' हुसैन

आफ़ताब हुसैन

जो कुछ निगाह में है हक़ीक़त में वो नहीं

आफ़ताब हुसैन

दिल-ए-मुज़्तर वफ़ा के बाब में ये जल्द-बाज़ी क्या

आफ़ताब हुसैन

अभी दिलों की तनाबों में सख़्तियाँ हैं बहुत

आफ़ताब हुसैन

मुनाफ़िक़त का निसाब पढ़ कर मोहब्बतों की किताब लिखना

आफ़ताब हुसैन

मक़ाम-ए-शौक़ से आगे भी इक रस्ता निकलता है

आफ़ताब हुसैन

मैं सोचता हूँ अगर इस तरफ़ वो आ जाता

आफ़ताब हुसैन

किसी तरह भी तो वो राह पर नहीं आया

आफ़ताब हुसैन

करता कुछ और है वो दिखाता कुछ और है

आफ़ताब हुसैन

कमी रखता हूँ अपने काम की तकमील में

आफ़ताब हुसैन

कहाँ किसी पे ये एहसान करने वाला हूँ

आफ़ताब हुसैन

कभी जो रास्ता हमवार करने लगता हूँ

आफ़ताब हुसैन

जब सफ़र से लौट कर आने की तय्यारी हुई

आफ़ताब हुसैन

इस अँधेरे में जो थोड़ी रौशनी मौजूद है

आफ़ताब हुसैन

गए मंज़रों से ये क्या उड़ा है निगाह में

आफ़ताब हुसैन

फ़सील-ए-शहर-ए-तमन्ना में दर बनाते हुए

आफ़ताब हुसैन

दिल भी आप को भूल चुका है

आफ़ताब हुसैन

धूप जब ढल गई तो साया नहीं

आफ़ताब हुसैन

प्यासी हैं रगें जिस्म को ख़ूँ मिल नहीं सकता

आफ़ताब आरिफ़

मुझ को मंज़र के सिले में वो सदा भेजता है

आफ़ताब अहमद शाह

मुमकिन है शय वही हो मगर हू-ब-हू न हो

आफ़ताब अहमद

किसी निशाँ से अलामत से या सनद से न हो

आफ़ताब अहमद

खुली आँखों में दर आने से पहले

आफ़ताब अहमद

यास है हसरत है ग़म है और शब-ए-दीजूर है

अफ़सर मेरठी

जिन को हर हालत में ख़ुश और शादमाँ पाता हूँ मैं

अफ़सर मेरठी

असर देखा दुआ जब रात भर की

अफ़सर मेरठी

आग़ाज़ हुआ है उल्फ़त का अब देखिए क्या क्या होना है

अफ़सर मेरठी

न जाने इस क़दर क्यूँ आप दीवाने से डरते हैं

अफ़सर माहपुरी