Hope Poetry (page 195)
शब को पाज़ेब की झंकार सी आ जाती है
अफ़सर माहपुरी
मेरे लिए साहिल का नज़ारा भी बहुत है
अफ़सर माहपुरी
क्या बताएँ हाल-ए-दिल उन की शनासाई के ब'अद
अफ़सर माहपुरी
बहार आएगी गुलशन में तो दार-ओ-गीर भी होगी
अफ़सर माहपुरी
तेरी ख़ुशबू का तराशा है ये पैकर किस ने
अफ़सर आज़री
वही जो हया थी निगार आते आते
अफ़सर इलाहाबादी
तिश्नगी बाक़ी रहे दीवानगी बाक़ी रहे
अफ़रोज़ तालिब
ये खुला जिस्म खुले बाल ये हल्के मल्बूस
अफ़रोज़ आलम
ये खुला जिस्म खुले बाल ये हल्के मल्बूस
अफ़रोज़ आलम
ज़ुल्मात
अफ़रोज़ आलम
तलाश
अफ़रोज़ आलम
तख़्लीक़
अफ़रोज़ आलम
पल-दो-पल
अफ़रोज़ आलम
ख़याल
अफ़रोज़ आलम
यूँ ख़बर किसे थी मेरी तिरी मुख़बिरी से पहले
अफ़रोज़ आलम
तू मेरी नींदें तलाशता है यही बहुत है
अफ़रोज़ आलम
ठोकर से फ़क़ीरों की दुनिया का बिखर जाना
अफ़रोज़ आलम
शम्स मादूम है तारों में ज़िया है तो सही
अफ़रोज़ आलम
जिगर को ख़ून किए दिल को बे-क़रार अभी
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
दुश्मनों को मिरे हमराज़ करोगे शायद
अफ़रोज़ आलम
बड़ा ख़ुशनुमा ये मक़ाम है नई ज़िंदगी की तलाश कर
अफ़रोज़ आलम
अत्तार के मस्कन में ये कैसी उदासी है
अफ़रोज़ आलम
ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है
अफ़रोज़ आलम
आप से उन्स हुआ चाहता है
अफ़रोज़ आलम
उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की
अफ़ीफ़ सिराज
हमारी तिश्ना-लबी अब सुबू से खेलेगी
अफ़ीफ़ सिराज
वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया
आदिल मंसूरी
मेरे टूटे हौसले के पर निकलते देख कर
आदिल मंसूरी