Love Poetry (page 199)
रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
नर्गिस-ए-मस्त तिरी जाए जो तुल बरसर-ए-गुल
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
मुझे तो इश्क़ में अब ऐश-ओ-ग़म बराबर है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
मेरी गो आह से जंगल न जले ख़ुश्क तो हो
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ख़ाल-ए-लब आफ़त-ए-जाँ था मुझे मालूम न था
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ख़ाल-ए-लब आफ़त-ए-जाँ था मुझे मालूम न था
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
जो जहाँ के आइना हैं दिल उन्हों के सादा हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इश्क़ में बू है किबरियाई की
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इस लब से रस न चूसे क़दह और क़दह से हम
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ग़ैरत-ए-गुल है तू और चाक-गरेबाँ हम हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक-न-शुद दो-शुद
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक न-शुद दो शुद
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
दस्त-ए-नासेह जो मिरे जेब को इस बार लगा
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
छुप के नज़रों से इन आँखों की फ़रामोश की राह
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
शोर-ए-दरिया है कहानी मेरी
बाक़र नक़वी
पग पग फूल खिले थे लेकिन तन-मन में थी आग
बाक़र नक़वी
खेत से बच कर गुज़रे बस्ती को वीरानी दे
बाक़र नक़वी
कभी तो याद के गुल-दान में सजाऊँ उसे
बाक़र नक़वी
दवा बग़ैर कोई तिफ़्ल मर गया तो क्या हुआ
बाक़र नक़वी
ऐ कहकशाँ-नवाज़ मुक़द्दर उजाल दे
बाक़र नक़वी
सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो
बाक़र मेहदी
मुझे दुश्मन से अपने इश्क़ सा है
बाक़र मेहदी
मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं
बाक़र मेहदी
काफ़िरी इश्क़ का शेवा है मगर तेरे लिए
बाक़र मेहदी
जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं
बाक़र मेहदी
ये रात
बाक़र मेहदी
उस ने कहा!
बाक़र मेहदी
टूटे शीशे की आख़िरी नज़्म
बाक़र मेहदी
सज़ा
बाक़र मेहदी