Love Poetry (page 352)
याद क्या क्या लोग दश्त-ए-बे-कराँ में आए थे
अहमद हमदानी
नित-नए रंग से करता रहा दिल को पामाल
अहमद हमदानी
मुँह अँधेरे घर से निकले फिर थे हंगामे बहुत
अहमद हमदानी
कुछ उस को याद करूँ उस का इंतिज़ार करूँ
अहमद हमदानी
ख़याल-ओ-ख़्वाब से घर कब तलक सजाएँ हम
अहमद हमदानी
गर्द कैसी है ये धुआँ सा क्या
अहमद हमदानी
दिलों को रंज ये कैसा है ये ख़ुशी क्या है
अहमद हमदानी
दिल तुझे पा के भी तन्हा होता
अहमद हमदानी
चाँद ओझल हो गया हर इक सितारा बुझ गया
अहमद हमदानी
अज़ल अबद से बहुत दूर झूमते थे हम
अहमद हमदानी
अब ये होगा शायद अपनी आग में ख़ुद जल जाएँगे
अहमद हमदानी
काफ़िर हूँ सर-फिरा हूँ मुझे मार दीजिए
अहमद फ़रहाद
ये जो इक सैल-ए-फ़ना है मिरे पीछे पीछे
अहमद फ़रीद
पर्दा-ए-महमिल उठे तो राज़-ए-वीराना खुले
अहमद फ़रीद
जब से इक चाँद की चाहत में सितारा हुआ हूँ
अहमद फ़रीद
दिन से बिछड़ी हुई बारात लिए फिरती है
अहमद फ़रीद
ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है
अहमद फ़राज़
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
अहमद फ़राज़
ज़िंदगी फैली हुई थी शाम-ए-हिज्राँ की तरह
अहमद फ़राज़
ज़िंदगी पर इस से बढ़ कर तंज़ क्या होगा 'फ़राज़'
अहमद फ़राज़
यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
अहमद फ़राज़
यूँ तो पहले भी हुए उस से कई बार जुदा
अहमद फ़राज़
ये किन नज़रों से तू ने आज देखा
अहमद फ़राज़
ये किन नज़रों से तू ने आज देखा
अहमद फ़राज़
वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद
अहमद फ़राज़
वो जिस घमंड से बिछड़ा गिला तो इस का है
अहमद फ़राज़
उस का क्या है तुम न सही तो चाहने वाले और बहुत
अहमद फ़राज़
उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है
अहमद फ़राज़
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त
अहमद फ़राज़
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
अहमद फ़राज़