Love Poetry (page 353)

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल

अहमद फ़राज़

तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

अहमद फ़राज़

तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई

अहमद फ़राज़

तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी

अहमद फ़राज़

तअ'ना-ए-नश्शा न दो सब को कि कुछ सोख़्ता-जाँ

अहमद फ़राज़

सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़

अहमद फ़राज़

सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

अहमद फ़राज़

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

अहमद फ़राज़

सो देख कर तिरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया

अहमद फ़राज़

सिलवटें हैं मिरे चेहरे पे तो हैरत क्यूँ है

अहमद फ़राज़

शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही

अहमद फ़राज़

शहर-वालों की मोहब्बत का मैं क़ाएल हूँ मगर

अहमद फ़राज़

साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले

अहमद फ़राज़

रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं

अहमद फ़राज़

रात भर हँसते हुए तारों ने

अहमद फ़राज़

क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों

अहमद फ़राज़

नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है

अहमद फ़राज़

न मिरे ज़ख़्म खिले हैं न तिरा रंग-ए-हिना

अहमद फ़राज़

मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगर

अहमद फ़राज़

'मीर' के मानिंद अक्सर ज़ीस्त करता था 'फ़राज़'

अहमद फ़राज़

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे

अहमद फ़राज़

किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी

अहमद फ़राज़

किस को बिकना था मगर ख़ुश हैं कि इस हीले से

अहमद फ़राज़

कभी 'फ़राज़' से आ कर मिलो जो वक़्त मिले

अहमद फ़राज़

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया

अहमद फ़राज़

जो ग़ज़ल आज तिरे हिज्र में लिक्खी है वो कल

अहमद फ़राज़

जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो

अहमद फ़राज़

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब

अहमद फ़राज़

हुजूम ऐसा कि राहें नज़र नहीं आतीं

अहमद फ़राज़