Sad Poetry (page 145)

नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है

एजाज़ सिद्दीक़ी

मिल सकेगी अब भी दाद-ए-आबला-पाई तो क्या

एजाज़ सिद्दीक़ी

दुनिया सबब-ए-शोरिश-ए-ग़म पूछ रही है

एजाज़ सिद्दीक़ी

शहर-ए-बीना के लोग

एजाज़ रिज़वी

वो एक पल की रिफ़ाक़त भी क्या रिफ़ाक़त थी

एजाज़ रहमानी

जहाँ पे डूब गया मेरी आस का सूरज

एजाज़ रहमानी

ज़ालिम से मुस्तफ़ा का अमल चाहते हैं लोग

एजाज़ रहमानी

साए में आबलों की जलन और बढ़ गई

एजाज़ रहमानी

रंग मौसम के साथ लाए हैं

एजाज़ रहमानी

नक़्श-बर-आब हो गया हूँ मैं

एजाज़ रहमानी

मिट गया ग़म तिरे तकल्लुम से

एजाज़ रहमानी

हवा के वास्ते इक काम छोड़ आया हूँ

एजाज़ रहमानी

हँसी लबों पे सजाए उदास रहता है

एजाज़ रहमानी

अब कर्ब के तूफ़ाँ से गुज़रना ही पड़ेगा

एजाज़ रहमानी

तब हज़ारों अँधेरों से

एजाज़ रही

सवाल सवाल सियाह कश्कोल

एजाज़ रही

काले मौसमों की आख़िरी रात

एजाज़ रही

थीं इक सुकूत से ज़ाहिर मोहब्बतें अपनी

एजाज़ उबैद

था वो जंगल कि नगर याद नहीं

एजाज़ उबैद

नए सफ़र में जो पिछले सफ़र के साथी थे

एजाज़ उबैद

मैं ने क्या काम ला-जवाब किया

एजाज़ उबैद

किस से मिलने जाओ अब किस से मुलाक़ातें करो

एजाज़ उबैद

हँसने में रोने की आदत कभी ऐसी तो न थी

एजाज़ उबैद

ग़म भी उतना नहीं कि तुम से कहें

एजाज़ उबैद

ऐसे ही दिन थे कुछ ऐसी शाम थी

एजाज़ उबैद

अभी तमाम आइनों में ज़र्रा ज़र्रा आब है

एजाज़ उबैद

सुस्त-रौ मुसाफ़िर की क़िस्मतों पे क्या रोना

एजाज़ गुल

कोई सबब तो है ऐसा कि एक उम्र से हैं

एजाज़ गुल

कभी क़तार से बाहर कभी क़तार के बीच

एजाज़ गुल

होता है फिर वो और किसी याद के सुपुर्द

एजाज़ गुल