Sad Poetry (page 151)
रिश्वत-ख़ोर सरकारी मुलाज़मीन
दिलावर फ़िगार
मौसीक़ी से इलाज
दिलावर फ़िगार
मर्दुम-गज़ीदा इंसान का इलाज
दिलावर फ़िगार
लंदन में जश्न-ए-ग़ालिब
दिलावर फ़िगार
लैला मजनूँ की शादी
दिलावर फ़िगार
लग गए हैं फ़ोन लगने में जो पच्चीस साल
दिलावर फ़िगार
कराची की बस
दिलावर फ़िगार
कराची का क़ब्रिस्तान
दिलावर फ़िगार
इश्क़ का परचा
दिलावर फ़िगार
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो
दिलावर फ़िगार
इलिएट्स-गर्ल्स-कॉलेज और कुल पाक ओ हिन्द मुशाएरा
दिलावर फ़िगार
क्रिकेट और मुशाइरा
दिलावर फ़िगार
चोर-साहिब से दरख़्वास्त
दिलावर फ़िगार
वो शख़्स कभी जिस ने मिरा घर नहीं देखा
दिलावर फ़िगार
मैं ने कहा कि शहर के हक़ में दुआ करो
दिलावर फ़िगार
जादा-ए-फ़न में बड़े सख़्त मक़ाम आते हैं
दिलावर फ़िगार
हुस्न पर ए'तिबार हद कर दी
दिलावर फ़िगार
मैं जब मैदान ख़ाली कर के आया
दिलावर अली आज़र
एक लम्हे के लिए तन्हा नहीं होने दिया
दिलावर अली आज़र
इक दिन जो यूँही पर्दा-ए-अफ़्लाक उठाया
दिलावर अली आज़र
यूँ दीदा-ए-ख़ूँ-बार के मंज़र से उठा मैं
दिलावर अली आज़र
मंज़र से उधर ख़्वाब की पस्पाई से आगे
दिलावर अली आज़र
मख़्फ़ी हैं अभी दिरहम-ओ-दीनार हमारे
दिलावर अली आज़र
लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की
दिलावर अली आज़र
ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ
दिलावर अली आज़र
कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं
दिलावर अली आज़र
हवस से जिस्म को दो-चार करने वाली हवा
दिलावर अली आज़र
हवा ने इस्म कुछ ऐसा पढ़ा था
दिलावर अली आज़र
बना रहा था कोई आब ओ ख़ाक से कुछ और
दिलावर अली आज़र
अक्स मंज़र में पलटने के लिए होता है
दिलावर अली आज़र