Sad Poetry (page 18)
दिल से दिल का रिश्ता होगा
इंद्र सराज़ी
वो एक शख़्स कि बाइस मिरे ज़वाल का था
इनाम-उल-हक़ जावेद
कभी लौट आया मैं दश्त से तो ये शहर भी
इनाम नदीम
बुझ जाएगा इक रोज़ तिरी याद का शोला
इनाम नदीम
ये मंज़र बे-दर-ओ-दीवार होता
इनाम नदीम
रास्ते जिस तरफ़ बुलाते हैं
इनाम नदीम
कोई बाग़ सा सजा हुआ मिरे सामने
इनाम नदीम
ख़ुद अपने उजाले से ओझल रहा है दिया जल रहा है
इनाम नदीम
जिस रोज़ तिरे हिज्र से फ़ुर्सत में रहूँगा
इनाम नदीम
दिल पर किसी पत्थर का निशाँ यूँ ही रहेगा
इनाम नदीम
अपनी ही रवानी में बहता नज़र आता है
इनाम नदीम
वो आते-जाते इधर देखता ज़रा सा है
इनाम कबीर
रवाँ नदी के किनारे सड़क पे रुक जाना
इनाम कबीर
होते होंगे इस दुनिया में अर्श के दा'वेदार बुलंद
इनाम हनफ़ी
आसूदा-ए-मता-ए-करम बोलते नहीं
इनाम हनफ़ी
तसव्वुरात में वो ज़ूम कर रहा था मुझे
इनआम आज़मी
समझने वाला मिरा मर्तबा समझता है
इनआम आज़मी
कभी तो चश्म-ए-फ़लक में हया दिखाई दे
इनआम आज़मी
जो चला आता है ख़्वाबों की तरफ़-दारी को
इनआम आज़मी
जिस तरफ़ देखिए बाज़ार उदासी का है
इनआम आज़मी
दर-ए-उमीद मुक़फ़्फ़ल नहीं हुआ अब तक
इनआम आज़मी
अजब उलझन है जो समझा नहीं हूँ
इम्तियाज़ अली गौहर
फिर आस-पास से दिल हो चला है मेरा उदास
इम्तियाज़ अली अर्शी
अगर है रेत की दीवार ध्यान टूटेगा
इम्तियाज़ अहमद राही
यूँही अक्सर मुझे समझा बुझा कर लौट जाती है
इम्तियाज़ अहमद
वो तबस्सुम था जहाँ शायद वहीं पर रह गया
इम्तियाज़ अहमद
तिरी फ़ुज़ूल बंदगी बना न दे ख़ुदा मुझे
इम्तियाज़ अहमद
ताराज ख़्वाहिशों का मुदावा न हो सका
इम्तियाज़ अहमद
वक़्त हर ज़ख़्म को भर देता है कुछ भी कीजे
इमरान-उल-हक़ चौहान
अजीब ख़ौफ़ का मौसम है इन दिनों 'इमरान'
इमरान-उल-हक़ चौहान