Sad Poetry (page 254)
इसी ज़मीं पे इसी आसमाँ में रहना है
अनीस अशफ़ाक़
हमेशा किसी इम्तिहाँ में रहा
अनीस अशफ़ाक़
तुम्हारे शहर में इतने मकाँ गिरे कैसे
अनीस अंसारी
पथरीली सी शाम में तुम ने ऐसे याद किया जानम
अनीस अंसारी
मिरा हर तीर निशाने पे न पहुँचा आख़िर
अनीस अंसारी
मैं सहरा था जज़ीरा हो गया हूँ
अनीस अंसारी
इस शहर के लोग अजीब से हैं अब सब ही तुम्हारे असीर हुए
अनीस अंसारी
दिल पर यूँही चोट लगी तो कुछ दिन ख़ूब मलाल किया
अनीस अंसारी
भर नहीं पाया अभी तक ज़ख़्म-ए-कारी हाए हाए
अनीस अंसारी
तिरे गेसुओं के साए में जो एक पल रहा हूँ
अनीस अहमद अनीस
शीशा ही चाहिए न मय-ए-अर्ग़वाँ मुझे
अनीस अहमद अनीस
नज़र मिलते ही साक़ी से गिरी इक बर्क़ सी दिल पर
अनीस अहमद अनीस
फ़िराक़-ए-यार में कुछ कहिए समझाया नहीं जाता
अनीस अहमद अनीस
चलो ये सच ही सही होगा ना-गहाँ गुज़रे
अनीस अहमद अनीस
अब ग़म का कोई ग़म न ख़ुशी की ख़ुशी मुझे
अनीस अहमद अनीस
दिल पर चोट पड़ी है तब तो आह लबों तक आई है
अंदलीब शादानी
मुझे इल्ज़ाम न दे तर्क-ए-शकेबाई का
अंदलीब शादानी
क्या कहिए रू-ए-हुस्न पे आलम नक़ाब का
अंदलीब शादानी
कोई अदा-शनास-ए-मोहब्बत हमें बताए
अंदलीब शादानी
जहाँ अहद-ए-तमन्ना ख़त्म हो जाए
अंदलीब शादानी
जहाँ अहद-ए-तमन्ना ख़त्म हो जाए
अंदलीब शादानी
हँसती आँखें हँसता चेहरा इक मजबूर बहाना है
अंदलीब शादानी
मुझे कर के चुप कोई कहता है हँस कर
आनंद नारायण मुल्ला
मैं फ़क़त इंसान हूँ हिन्दू मुसलमाँ कुछ नहीं
आनंद नारायण मुल्ला
ख़ून-ए-जिगर के क़तरे और अश्क बन के टपकें
आनंद नारायण मुल्ला
हम ने भी की थीं कोशिशें हम न तुम्हें भुला सके
आनंद नारायण मुल्ला
ग़म-ए-हयात शरीक-ए-ग़म-ए-मोहब्बत है
आनंद नारायण मुल्ला
गले लगा के किया नज़्र-ए-शो'ला-ए-आतिश
आनंद नारायण मुल्ला
अश्क-ए-ग़म-ए-उल्फ़त में इक राज़-ए-निहानी है
आनंद नारायण मुल्ला
मोहिब्बान-ए-वतन का नारा
आनंद नारायण मुल्ला