Sad Poetry (page 29)
कुछ भी नहीं कहीं नहीं ख़्वाब के इख़्तियार में
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कोई जुनूँ कोई सौदा न सर में रक्खा जाए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब-ए-देरीना से रुख़्सत का सबब पूछते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़ौफ़ के सैल-ए-मुसलसल से निकाले मुझे कोई
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़ल्क़ ने इक मंज़र नहीं देखा बहुत दिनों से
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कहीं से कोई हर्फ़-ए-मो'तबर शायद न आए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
जुनूँ का रंग भी हो शोला-ए-नुमू का भी हो
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अहल-ए-जब्र के नाम-ओ-नसब से वाक़िफ़ हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हिज्र की धूप में छाँव जैसी बातें करते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हरीम-ए-लफ़्ज़ में किस दर्जा बे-अदब निकला
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़म-ए-जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ैरों से दाद-ए-जौर-ओ-जफ़ा ली गई तो क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
फ़ज़ा में वहशत-ए-संग-ओ-सिनाँ के होते हुए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दोस्त क्या ख़ुद को भी पुर्सिश की इजाज़त नहीं दी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दयार-ए-नूर में तीरा-शबों का साथी हो
इफ़्तिख़ार आरिफ़
बस्ती भी समुंदर भी बयाबाँ भी मिरा है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सुन सुन के चुप हैं ताना-ए-अग़्यार क्या करें
इफ़तिख़ार अहमद फख्र
हुस्न यूँ इश्क़ से नाराज़ है अब
इफ़्तिख़ार आज़मी
वीराना-ए-ख़याल
इफ़्तिख़ार आज़मी
शौक़
इफ़्तिख़ार आज़मी
एहसास
इफ़्तिख़ार आज़मी
आप-बीती
इफ़्तिख़ार आज़मी
शोर-ए-दरिया-ए-वफ़ा इशरत-ए-साहिल के क़रीब
इफ़्तिख़ार आज़मी
रह-ए-वफ़ा से मैं इक गाम भी हटा तो नहीं
इफ़्तिख़ार आज़मी
मक़्तल के इस सुकूत पे हैरत है क्या कहें
इफ़्तिख़ार आज़मी