Sad Poetry (page 27)
रात भर दर्द की बरसात में धोई हुई सुब्ह
इफ़्तिख़ार बुख़ारी
दश्त-ए-बे-सम्त में रुकना भी सफ़र ऐसा था
इफ़्तिख़ार बुख़ारी
भर आईं आँखें किसी भूली याद से शाम के मंज़र में
इफ़्तिख़ार बुख़ारी
बे-ख़बर मुझ से मिरे दिल में हमेशा हँसता
इफ़्तिख़ार बुख़ारी
बनती है सँवरती है बिखर जाती है दुनिया
इफ़्तिख़ार बुख़ारी
ये सारी जन्नतें ये जहन्नम अज़ाब ओ अज्र
इफ़्तिख़ार आरिफ़
यही लहजा था कि मेआर-ए-सुख़न ठहरा था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
रास आने लगी दुनिया तो कहा दिल ने कि जा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
मिरे सारे हर्फ़ तमाम हर्फ़ अज़ाब थे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
मंसब न कुलाह चाहता हूँ
इफ़्तिख़ार आरिफ़
मैं चुप रहा कि वज़ाहत से बात बढ़ जाती
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हर इक से पूछते फिरते हैं तेरे ख़ाना-ब-दोश
इफ़्तिख़ार आरिफ़
घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़म-ए-जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
इक ख़्वाब ही तो था जो फ़रामोश हो गया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन में
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई
इफ़्तिख़ार आरिफ़
अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
यक़ीन से यादों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता
इफ़्तिख़ार आरिफ़
शहर-आशोब
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सौग़ात
इफ़्तिख़ार आरिफ़
सहरा में एक शाम
इफ़्तिख़ार आरिफ़
पस च-बायद-कर्द
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कूच
इफ़्तिख़ार आरिफ़
इंतिबाह
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हवाएँ अन-पढ़ हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़