Sad Poetry (page 297)
तिरा आँचल इशारे दे रहा है
अकबर हमीदी
शरार-ए-संग जो इस शोर-ओ-शर से निकलेगा
अकबर हमीदी
रात आई है बच्चों को पढ़ाने में लगा हूँ
अकबर हमीदी
कई आवाज़ों की आवाज़ हूँ मैं
अकबर हमीदी
इक लम्हे ने जीवन-धारा रोक लिया
अकबर हमीदी
देखने को कोई तय्यार नहीं है भाई
अकबर हमीदी
अभी ज़मीन को हफ़्त आसमाँ बनाना है
अकबर हमीदी
ये सितम इक ख़्वाहिश-ए-मौहूम पर
अकबर हैदरी
मौत उस बेकस की ग़ायत ही सही
अकबर हैदरी
क्या कहूँ जज़्बात का तूफ़ान कितना तेज़ है
अकबर हैदरी
किस चमन की ख़ाक में फूलों का मुस्तक़बिल नहीं
अकबर हैदरी
वस्ल हो या फ़िराक़ हो 'अकबर'
अकबर इलाहाबादी
रहता है इबादत में हमें मौत का खटका
अकबर इलाहाबादी
क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
अकबर इलाहाबादी
जब ग़म हुआ चढ़ा लीं दो बोतलें इकट्ठी
अकबर इलाहाबादी
ग़म-ख़ाना-ए-जहाँ में वक़अत ही क्या हमारी
अकबर इलाहाबादी
बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफ़ा करें
अकबर इलाहाबादी
आई होगी किसी को हिज्र में मौत
अकबर इलाहाबादी
नई तहज़ीब
अकबर इलाहाबादी
मदरसा अलीगढ़
अकबर इलाहाबादी
दरबार1911
अकबर इलाहाबादी
ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे
अकबर इलाहाबादी
ये सुस्त है तो फिर क्या वो तेज़ है तो फिर क्या
अकबर इलाहाबादी
वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे
अकबर इलाहाबादी
उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़
अकबर इलाहाबादी
उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है
अकबर इलाहाबादी
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है
अकबर इलाहाबादी
तरीक़-ए-इश्क़ में मुझ को कोई कामिल नहीं मिलता
अकबर इलाहाबादी
सदियों फ़िलासफ़ी की चुनाँ और चुनीं रही
अकबर इलाहाबादी
न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइराना ज़बान बाक़ी
अकबर इलाहाबादी