Sad Poetry (page 299)

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अकबर इलाहाबादी

ये तन घिरा हुआ छोटे से घर में रहता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था

अकबर अली खान अर्शी जादह

तेरा ख़याल जाँ के बराबर लगा मुझे

अकबर अली खान अर्शी जादह

सिखा सकी न जो आदाब-ए-मय वो ख़ू क्या थी

अकबर अली खान अर्शी जादह

सज़ा है किस के लिए और जज़ा है किस के लिए

अकबर अली खान अर्शी जादह

सन्नाटा तूफ़ाँ से सिवा हो ये भी तो हो सकता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

मिरे ख़्वाबों में ख़यालों में मिरे पास रहो

अकबर अली खान अर्शी जादह

किया है मैं ने तआ'क़ुब वो सुब्ह-ओ-शाम अपना

अकबर अली खान अर्शी जादह

कभी ज़ख़्म ज़ख़्म निखर के देख कभी दाग़ दाग़ सँवर के देख

अकबर अली खान अर्शी जादह

हुस्न ही के दम से हैं ये कहानियाँ सारी

अकबर अली खान अर्शी जादह

आज यूँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे

अकबर अली खान अर्शी जादह

ये उदासी का सबब पूछने वाले 'अजमल'

अजमल सिराज

रह गया दिल में इक दर्द सा

अजमल सिराज

कुछ कहना चाहते थे कि ख़ामोश हो गए

अजमल सिराज

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

अजमल सिराज

ग़म सभी दिल से रुख़्सत हुए

अजमल सिराज

बस एक शाम का हर शाम इंतिज़ार रहा

अजमल सिराज

'अजमल'-सिराज हम उसे भूल हुए तो हैं

अजमल सिराज

तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँगा मैं

अजमल सिराज

सुनी है चाप बहुत वक़्त के गुज़रने की

अजमल सिराज

पेश जो आया सर-ए-साहिल शब बतलाया

अजमल सिराज

नज़र आ रहे हैं जो तन्हा से हम

अजमल सिराज

मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है

अजमल सिराज

किसी की क़ैद से आज़ाद हो के रह गए हैं

अजमल सिराज

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

अजमल सिराज

जो कल हैरान थे उन को परेशाँ कर के छोड़ूँगा

अजमल सिराज

जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब

अजमल सिराज

हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे

अजमल सिराज

गुज़र गई है अभी साअत-ए-गुज़िश्ता भी

अजमल सिराज