Sad Poetry (page 300)

दुश्वार है इस अंजुमन-आरा को समझना

अजमल सिराज

दीवार याद आ गई दर याद आ गया

अजमल सिराज

और तो ख़ैर क्या रह गया

अजमल सिराज

कभी ख़ौफ़ था तिरे हिज्र का कभी आरज़ू के ज़वाल का

अजमल सिद्दीक़ी

जिस दिन से गया वो जान-ए-ग़ज़ल हर मिसरे की सूरत बिगड़ी

अजमल सिद्दीक़ी

ज़िंदगी रोज़ बनाती है बहाने क्या क्या

अजमल सिद्दीक़ी

रो रो के बयाँ करते फिरो रंज-ओ-अलम ख़ूब

अजमल सिद्दीक़ी

न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

अजमल सिद्दीक़ी

खुल के बरसना और बरस कर फिर खुल जाना देखा है

अजमल सिद्दीक़ी

ख़त जो तेरे नाम लिखा, तकिए के नीचे रखता हूँ

अजमल सिद्दीक़ी

इतराता गरेबाँ पर था बहुत, रह-ए-इश्क़ में कब का चाक हुआ

अजमल सिद्दीक़ी

दुखे दिलों पे जो पड़ जाए वो तबीब नज़र

अजमल सिद्दीक़ी

तार-ए-नज़र भी ग़म की तमाज़त से ख़ुश्क है

अजमल अजमली

माँ ने लिखा है ख़त में जहाँ जाओ ख़ुश रहो

अजमल अजमली

कितनी तवील क्यूँ न हो बातिल की ज़िंदगी

अजमल अजमली

हज़ार मंज़िल-ए-ग़म से गुज़र चुके लेकिन

अजमल अजमली

याद-ए-फ़िराक-ए-यार तिरा शुक्रिया बहुत

अजमल अजमली

वक़्त-ए-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ

अजमल अजमली

तिरी नज़र भी नहीं हर्फ़-ए-मुद्दआ भी नहीं

अजमल अजमली

शहर शहर ढूँड आए दर-ब-दर पुकार आए

अजमल अजमली

रास्ते के पेच-ओ-ख़म क्या शय हैं सोचा ही नहीं

अजमल अजमली

हर उजाला नई सहर तो नहीं

अजमल अजमली

दो पल के हैं ये सब मह ओ अख़्तर न भूलना

अजमल अजमली

ऐ हुस्न जब से राज़ तिरा पा गए हैं हम

अजमल अजमली

सितम ये है वो कभी भूल कर नहीं आया

आजिज़ मातवी

महव-ए-हैरत हूँ ख़राश-ए-दस्त-ए-ग़म को देख कर

आजिज़ मातवी

यूँ तुझ से दूर दूर रहूँ ये सज़ा न दे

आजिज़ मातवी

मौजूद हैं वो भी बालीं पर अब मौत का टलना मुश्किल है

आजिज़ मातवी

मय-ख़ाने पर काले बादल जब घिर घिर कर आते हैं

आजिज़ मातवी

जहाँ न दिल को सुकून है न है क़रार मुझे

आजिज़ मातवी