Sad Poetry (page 301)

जब कभी मद्द-ए-मुक़ाबिल वो रुख़-ए-ज़ेबा हुआ

आजिज़ मातवी

हर-सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँडते हैं हम

आजिज़ मातवी

हंगामा क्यूँ बपा है ज़रा बाम पर से देख

आजिज़ मातवी

दर्द-ए-मुसलसल से आहों में पैदा वो तासीर हुई

आजिज़ मातवी

ज़िंदगी में प्यार का सौदा करो

अजीत सिंह हसरत

ज़माने हो गए तेरे करम की आस लगी

अजीत सिंह हसरत

वो हर्फ़ हर्फ़ मुकम्मल किताब कर देगा

अजीत सिंह हसरत

मुझ को प्रेम कहानी कर दो

अजीत सिंह हसरत

लब-ए-दरिया जो प्यासे मर गए हैं

अजीत सिंह हसरत

ख़ाक में मिलना था आख़िर बे-निशाँ होना ही था

अजीत सिंह हसरत

जुस्तुजू में कमाल करता जा

अजीत सिंह हसरत

जब मेरा घर बहिश्त सी गुल-वादियों में था

अजीत सिंह हसरत

इश्क़ जन्मों का है सफ़र शायद

अजीत सिंह हसरत

इस चमन का अजीब माली है

अजीत सिंह हसरत

हम को याद न आओ अब

अजीत सिंह हसरत

गुज़रे जिधर से नूर बिखेरे चले गए

अजीत सिंह हसरत

इक याद सो रहे को उठाती है आज भी

अजीत सिंह हसरत

धुआँ सिफ़त हूँ ख़लाओं का है सफ़र मुझ को

अजीत सिंह हसरत

वो जो फूल थे तिरी याद के तह-ए-दस्त-ए-ख़ार चले गए

अजय सहाब

वही हैं क़त्ल-ओ-ग़ारत और वही कोहराम है साक़ी

अजय सहाब

सहरा-ए-ला-हुदूद में तिश्ना-लबी की ख़ैर

अजय सहाब

लगा के धड़कन में आग मेरी ब-रंग-ए-रक़्स-ए-शरर गया वो

अजय सहाब

जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं

अजय सहाब

हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के

अजय सहाब

फ़न जो मेआ'र तक नहीं पहुँचा

अजय सहाब

इक बंद हो गया है तो खोलेंगे बाब और

अजय सहाब

बिखरा हूँ जब मैं ख़ुद यहाँ कोई मुझे गिराए क्यूँ

अजय सहाब

भूल पाए न तुझे आज भी रोने वाले

अजय सहाब

अश्कों से कब मिटे हैं दामन के दाग़ यारो

अजय सहाब

तअल्लुक़ किर्चियों की शक्ल में बिखरा तो है फिर भी

ऐतबार साजिद