Sad Poetry (page 303)

कहा दिन को भी ये घर किस लिए वीरान रहता है

ऐतबार साजिद

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

ऐतबार साजिद

जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो

ऐतबार साजिद

दिल हैं यूँ मुज़्तरिब मकानों में

ऐतबार साजिद

ढूँडते क्या हो इन आँखों में कहानी मेरी

ऐतबार साजिद

धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा

ऐतबार साजिद

छोटे छोटे से मफ़ादात लिए फिरते हैं

ऐतबार साजिद

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें

ऐतबार साजिद

बंदे ज़मीन और आसमाँ सरमा की शब कहानियाँ

ऐतबार साजिद

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी

ऐतबार साजिद

आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है

ऐतबार साजिद

आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

तू ही इंसाफ़ से कह जिस का ख़फ़ा यार रहे

ऐश देहलवी

फूल अल्लाह ने बनाए हैं महकने के लिए

ऐश देहलवी

फिरा किसी का इलाही किसी से यार न हो

ऐश देहलवी

न छोड़ी ग़म ने मिरे इक जिगर में ख़ून की बूँद

ऐश देहलवी

मैं बुरा ही सही भला न सही

ऐश देहलवी

क्या हुए आशिक़ उस शकर-लब के

ऐश देहलवी

किसी की नेक हो या बद जहाँ में ख़ू नहीं छुपती

ऐश देहलवी

जुरअत ऐ दिल मय ओ मीना है वो ख़ुद-काम भी है

ऐश देहलवी

जो होता आह तिरी आह-ए-बे-असर में असर

ऐश देहलवी

जिस दिल में तिरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं होता

ऐश देहलवी

दोस्त जब दिल सा आश्ना ही नहीं

ऐश देहलवी

बातें न किस ने हम को कहीं तेरे वास्ते

ऐश देहलवी

ज़ुल्मतों में गो ठहरने को ठहर जाते हैं लोग

ऐश बर्नी

मैं हँस रहा था गरचे मिरे दिल में दर्द था

ऐश बर्नी

हर इक शय पर बहार-ए-ज़िंदगी महसूस करता हूँ

ऐश बर्नी

ज़ेहन पर जब दर्द ख़ामोशी की चादर तानता है

ऐनुद्दीन आज़िम

वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है

ऐनुद्दीन आज़िम

सताइश न कीजिए तबर्रा सही

ऐनुद्दीन आज़िम