Sad Poetry (page 304)

पाँव फँसे में हाथ छुड़ाने आया था

ऐनुद्दीन आज़िम

पढ़ो इबारत-ए-तख़्लीक़-ए-दर्द चेहरे पर

ऐनुद्दीन आज़िम

मुझी में जीता है सूरज तमाम होने तक

ऐनुद्दीन आज़िम

मैं ने जब हद से गुज़रने का इरादा कर लिया

ऐनुद्दीन आज़िम

ला-मकाँ से भी परे ख़ुद से मुलाक़ात करें

ऐनुद्दीन आज़िम

क्या करूँ ज़र्फ़-ए-शनासाई को

ऐनुद्दीन आज़िम

कारोबारी शहरों में ज़ेहन-ओ-दिल मशीनें हैं जिस्म कारख़ाना है

ऐनुद्दीन आज़िम

दर्द तेरा मिरे सीने से निकाला न गया

ऐनुद्दीन आज़िम

अब जुनूँ के रत-जगे ख़िरद में आ गए

ऐनुद्दीन आज़िम

मैं अपना कार-ए-वफ़ा आज़माऊँगा फिर भी

ऐन ताबिश

हर ऐसे-वैसे से क़ुफ़्ल-ए-क़फ़स नहीं खुलता

ऐन ताबिश

है एक ही लम्हा जो कहीं वस्ल कहीं हिज्र

ऐन ताबिश

इक ज़रा चैन भी लेते नहीं 'ताबिश'-साहब

ऐन ताबिश

रात अभी आधी गुज़री है

ऐन ताबिश

पुरानी फ़ाइलों में गुनगुनाती शाम

ऐन ताबिश

मुलाक़ातें नहीं फिर भी मुलाक़ातें

ऐन ताबिश

मैं अल्बम के वरक़ जब भी उलटता हूँ

ऐन ताबिश

हवेली मौत की दहलीज़ पर

ऐन ताबिश

इक शहर था इक बाग़ था

ऐन ताबिश

बदलने का कोई मौसम नहीं होता

ऐन ताबिश

अदम से परे

ऐन ताबिश

यहाँ के रंग बड़े दिल-पज़ीर हुए हैं

ऐन ताबिश

वही जुनूँ की सोख़्ता-जानी वही फ़ुसूँ अफ़्सानों का

ऐन ताबिश

ताबिश ये भला कौन सी रुत आई है जानी

ऐन ताबिश

मुझ को ना-कर्दा गुनह का मो'तरिफ़ होना पड़ा

ऐन ताबिश

मेरी तन्हाई के एजाज़ में शामिल है वही

ऐन ताबिश

कैसे अफ़्सूँ थे वहाँ कैसे फ़साने थे उधर

ऐन ताबिश

गुज़रते वक़्त को बुनियाद करने वाला हूँ

ऐन ताबिश

बज़्म ख़ाली नहीं मेहमान निकल आते हैं

ऐन ताबिश

आवारा भटकता रहा पैग़ाम किसी का

ऐन ताबिश