Sad Poetry (page 302)
रिहा कर दे क़फ़स की क़ैद से घायल परिंदे को
ऐतबार साजिद
पहले ग़म-ए-फ़ुर्क़त के ये तेवर तो नहीं थे
ऐतबार साजिद
मुख़्तलिफ़ अपनी कहानी है ज़माने भर से
ऐतबार साजिद
मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती
ऐतबार साजिद
मैं तकिए पर सितारे बो रहा हूँ
ऐतबार साजिद
किसी को साल-ए-नौ की क्या मुबारकबाद दी जाए
ऐतबार साजिद
जुदाइयों की ख़लिश उस ने भी न ज़ाहिर की
ऐतबार साजिद
भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें
ऐतबार साजिद
फ़त्ह का ग़म
ऐतबार साजिद
ये ठीक है कि बहुत वहशतें भी ठीक नहीं
ऐतबार साजिद
ये बरसों का तअल्लुक़ तोड़ देना चाहते हैं हम
ऐतबार साजिद
वो पहली जैसी वहशतें वो हाल ही नहीं रहा
ऐतबार साजिद
तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए
ऐतबार साजिद
तिरे जैसा मेरा भी हाल था न सुकून था न क़रार था
ऐतबार साजिद
तर्क-ए-तअल्लुक़ कर तो चुके हैं इक इम्कान अभी बाक़ी है
ऐतबार साजिद
शहर-ए-हवा में जलते रहना अंदेशों की चौखट पर
ऐतबार साजिद
रस्ते का इंतिख़ाब ज़रूरी सा हो गया
ऐतबार साजिद
फूलों में वो ख़ुशबू वो सबाहत नहीं आई
ऐतबार साजिद
फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे
ऐतबार साजिद
न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का
ऐतबार साजिद
मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था
ऐतबार साजिद
मुझे वो कुंज-ए-तन्हाई से आख़िर कब निकालेगा
ऐतबार साजिद
मुझे ऐसा लुत्फ़ अता किया कि जो हिज्र था न विसाल था
ऐतबार साजिद
मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ
ऐतबार साजिद
मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है
ऐतबार साजिद
मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ
ऐतबार साजिद
किसी ने दिल के ताक़ पर जला के रख दिया हमें
ऐतबार साजिद
किसी को हम से हैं चंद शिकवे किसी को बेहद शिकायतें हैं
ऐतबार साजिद
कैसे कहीं कि जान से प्यारा नहीं रहा
ऐतबार साजिद
कहा तख़्लीक़-ए-फ़न बोले बहुत दुश्वार तो होगी
ऐतबार साजिद