Sad Poetry (page 341)
मिज़ाज-ओ-मर्तबा-ए-चश्म-ए-नम को पहचाने
अदा जाफ़री
कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा
अदा जाफ़री
ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था
अदा जाफ़री
ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई
अदा जाफ़री
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
जब दिल की रहगुज़र पे तिरा नक़्श-ए-पा न था
अदा जाफ़री
होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
अदा जाफ़री
हर गाम सँभल सँभल रही थी
अदा जाफ़री
हर इक दरीचा किरन किरन है जहाँ से गुज़रे जिधर गए हैं
अदा जाफ़री
हाल खुलता नहीं जबीनों से
अदा जाफ़री
गुलों सी गुफ़्तुगू करें क़यामतों के दरमियाँ
अदा जाफ़री
गुलों को छू के शमीम-ए-दुआ नहीं आई
अदा जाफ़री
ढलके ढलके आँसू ढलके
अदा जाफ़री
चाक-ए-दिल भी कभी सिलते होंगे
अदा जाफ़री
बेगानगी-ए-तर्ज़-ए-सितम भी बहाना-साज़
अदा जाफ़री
अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना
अदा जाफ़री
आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है
अदा जाफ़री
आलम ही और था जो शनासाइयों में था
अदा जाफ़री
आख़िरी टीस आज़माने को
अदा जाफ़री
आगे हरीम-ए-ग़म से कोई रास्ता न था
अदा जाफ़री
तज्दीद-ए-रिवायात-ए-कुहन करते रहेंगे
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
क़फ़स से छुटने पे शाद थे हम कि लज़्ज़त-ए-ज़िंदगी मिलेगी
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
हर एहतिमाम है दो दिन की ज़िंदगी के लिए
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
गिला किस से करें अग़्यार-ए-दिल-आज़ार कितने हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
गया तो हुस्न न दीवार में न दर में था
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
ये सच है उस से बिछड़ कर मुझे ज़माना हुआ
अबुल हसनात हक़्क़ी
वो आ रहा था मगर मैं निकल गया कहीं और
अबुल हसनात हक़्क़ी
ये इक और हम ने क़रीना किया
अबुल हसनात हक़्क़ी
ये इक और हम ने क़रीना किया
अबुल हसनात हक़्क़ी