Sad Poetry (page 342)

तमाम हिज्र उसी का विसाल है उस का

अबुल हसनात हक़्क़ी

शिकस्त-ए-अहद पर इस के सिवा बहाना भी क्या

अबुल हसनात हक़्क़ी

शब को हर रंग में सैलाब तुम्हारा देखें

अबुल हसनात हक़्क़ी

नुमू तो पहले भी था इज़्तिराब मैं ने दिया

अबुल हसनात हक़्क़ी

नक़्श-ए-यक़ीं तिरा वजूद-ए-वहम बुझा गुमाँ बुझा

अबुल हसनात हक़्क़ी

बे-नियाज़-ए-दहर कर देता है इश्क़

अबुल हसनात हक़्क़ी

बे-नियाज़ दहर कर देता है इश्क़

अबुल हसनात हक़्क़ी

ज़ब्त कर आह बार बार न कर

अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र

मुश्किल है पता चलना क़िस्सों से मोहब्बत का

अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र

कोह-ए-ग़म से क्या ग़रज़ फ़िक्र-ए-बुताँ से क्या ग़रज़

अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र

ख़ामोश इस तरह से न जल कर धुआँ उठा

अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र

है आम अज़ल ही से फ़ैज़ान मोहब्बत का

अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र

मेहनत से मिल गया जो सफ़ीने के बीच था

अबु तुराब

ये बंदगी का सदा अब समाँ रहे न रहे

अबु मोहम्मद वासिल

तसव्वुरात में इन को बुला के देख लिया

अबु मोहम्मद वासिल

रह-ए-वफ़ा में उन्हीं की ख़ुशी की बात करो

अबु मोहम्मद वासिल

मसरूर हो रहे हैं ग़म-ए-आशिक़ी से हम

अबु मोहम्मद वासिल

जबीन-ए-शौक़ पर कोई हुआ है मेहरबाँ शायद

अबु मोहम्मद वासिल

हसरत-ए-दीद रही दीद का ख़्वाहाँ हो कर

अबु मोहम्मद वासिल

अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती

अबु मोहम्मद वासिल

आगे वो जा भी चुके लुत्फ़-ए-नज़ारा भी गया

अबु मोहम्मद वासिल

तकमील-ए-आरज़ू से भी होता है ग़म कभी

अबु मोहम्मद सहर

रह-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा भी कूचा-ओ-बाज़ार हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

इश्क़ को हुस्न के अतवार से क्या निस्बत है

अबु मोहम्मद सहर

हिन्दू से पूछिए न मुसलमाँ से पूछिए

अबु मोहम्मद सहर

हमें तन्हाइयों में यूँ तो क्या क्या याद आता है

अबु मोहम्मद सहर

ग़म-ए-हबीब नहीं कुछ ग़म-ए-जहाँ से अलग

अबु मोहम्मद सहर

बर्क़ से खेलने तूफ़ान पे हँसने वाले

अबु मोहम्मद सहर

ज़िंदगी ख़ाक-बसर शोला-ब-जाँ आज भी है

अबु मोहम्मद सहर

ज़मीर-ए-नौ-ए-इंसानी के दिन हैं

अबु मोहम्मद सहर