Sad Poetry (page 343)
ये तो नहीं कि बादिया-पैमा न आएगा
अबु मोहम्मद सहर
वक़्त ग़मनाक सवालों में न बर्बाद करें
अबु मोहम्मद सहर
सब की आँखों में जो समाया था
अबु मोहम्मद सहर
सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए
अबु मोहम्मद सहर
माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे
अबु मोहम्मद सहर
ख़्वाबों का नश्शा है न तमन्ना का सिलसिला
अबु मोहम्मद सहर
खो के देखा था पा के देख लिया
अबु मोहम्मद सहर
काली ग़ज़ल सुनो न सुहानी ग़ज़ल सुनो
अबु मोहम्मद सहर
काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे
अबु मोहम्मद सहर
जब ये दावे थे कि हर दुख का मुदावा हो गए
अबु मोहम्मद सहर
इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके
अबु मोहम्मद सहर
हर ख़ौफ़ हर ख़तर से गुज़रना भी सीखिए
अबु मोहम्मद सहर
बस्तियाँ लुटती हैं ख़्वाबों के नगर जलते हैं
अबु मोहम्मद सहर
अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके
अबु मोहम्मद सहर
वक़्त-ए-रुख़्सत भीगती पलकों का मंज़र याद है
अबसार अब्दुल अली
तीर-अंदाजों को अंदाज़ा नहीं
अबसार अब्दुल अली
जो नहीं लगती थी कल तक अब वही अच्छी लगी
अबसार अब्दुल अली
साथ मेरे तेरे जो दुख था सो प्यारे ऐश था
आबरू शाह मुबारक
रोवने नीं मुझ दिवाने के किया सियानों का काम
आबरू शाह मुबारक
क़ौल 'आबरू' का था कि न जाऊँगा उस गली
आबरू शाह मुबारक
फिरते थे दश्त दश्त दिवाने किधर गए
आबरू शाह मुबारक
मैं निबल तन्हा न इस दुनिया की सोहबत सीं हुआ
आबरू शाह मुबारक
ख़ुद अपनी आदमी को बड़ी क़ैद-ए-सख़्त है
आबरू शाह मुबारक
इश्क़ का तीर दिल में लागा है
आबरू शाह मुबारक
ग़म सीं अहल-ए-बैत के जी तो तिरा कुढ़ता नहीं
आबरू शाह मुबारक
ग़म से हम सूख जब हुए लकड़ी
आबरू शाह मुबारक
ग़म के पीछो रास्त कहते हैं कि शादी होवे है
आबरू शाह मुबारक
दिल्ली में दर्द-ए-दिल कूँ कोई पूछता नहीं
आबरू शाह मुबारक
बोसाँ लबाँ सीं देने कहा कह के फिर गया
आबरू शाह मुबारक
अफ़्सोस है कि बख़्त हमारा उलट गया
आबरू शाह मुबारक