Sad Poetry (page 345)
ग़म से निस्बत है जिन्हें ज़ब्त-ए-अलम करते हैं
अबरार किरतपुरी
वसवसे दिल में न रख ख़ौफ़-ए-रसन ले के न चल
अबरार किरतपुरी
बाग़बाँ जश्न-ए-बहाराँ नहीं होने देते
अबरार किरतपुरी
शाम से मिलने गया तो रात ने ठहरा लिया
अबरार हामिद
क्या क्या धरे अजूबे हैं शहर-ए-ख़याल में
अबरार हामिद
ख़ुशी के वक़्त भी तुझ को मलाल कैसा है
अबरार हामिद
ख़ुश-बख़्त हैं आज़ाद हैं जो अपने सुख़न में
अबरार हामिद
दिए की लौ से न जल जाए तीरगी शब की
अबरार हामिद
बिफरी लहरें रात अँधेरी और बला की आँधी है
अबरार हामिद
तमाम रात वो पहलू को गर्म करता रहा
अबरार आज़मी
शायद तुम्हारी याद मिरे पास आ गई
अबरार आज़मी
ख़ुशनुमा दीवार-ओ-दर के ख़्वाब ही देखा किए
अबरार आज़मी
कमरे में धुआँ दर्द की पहचान बना था
अबरार आज़मी
गुम-शुदा
अबरार आज़मी
एहसास
अबरार आज़मी
तुम्हारी बज़्म में जिस बात का भी चर्चा था
अबरार आज़मी
तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था
अबरार आज़मी
सन्नाटे का दर्द निखारा करता हूँ
अबरार आज़मी
किस का है जुर्म किस की ख़ता सोचना पड़ा
अबरार आज़मी
ख़याल लम्स का कार-ए-सवाब जैसा था
अबरार आज़मी
कमरे में धुआँ दर्द की पहचान बना था
अबरार आज़मी
धूप चमकी रात की तस्वीर पीली हो गई
अबरार आज़मी
ये ऊँट और किसी के हैं दश्त मेरा है
अबरार अहमद
याद भी तेरी मिट गई दिल से
अबरार अहमद
मरकज़-ए-जाँ तो वही तू है मगर तेरे सिवा
अबरार अहमद
गुंजाइश-ए-अफ़्सोस निकल आती है हर रोज़
अबरार अहमद
गो फ़रामोशी की तकमील हुआ चाहती है
अबरार अहमद
ज़िंदा आदमी से कलाम
अबरार अहमद
तुम जो आते हो
अबरार अहमद
मिट्टी से एक मुकालिमा
अबरार अहमद