Sad Poetry (page 347)
बेकसी का हाल मय्यत से अयाँ हो जाएगा
अब्र अहसनी गनौरी
मगर ये तीरगी जाने का नाम लेती नहीं
आबिद वदूद
अब क़फ़स और गुलिस्ताँ में कोई फ़र्क़ नहीं
आबिद वदूद
फटा हुआ जो गरेबाँ दिखाई देता है
आबिद वदूद
न घर सुकून-कदा है न कारख़ाना-ए-इश्क़
आबिद वदूद
जब से दरिया में है तुग़्यानी बहुत
आबिद वदूद
हाथ में माहताब हो जैसे
आबिद वदूद
अपने अंदर भी हम-नवाई नहीं
आबिद वदूद
कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई
आबिद सयाल
कहीं से बास नए मौसमों की लाती हुई
आबिद सयाल
कफ़-ए-ख़िज़ाँ पे खिला मैं इस ए'तिबार के साथ
आबिद सयाल
चाँदनी रात है उदासी है
आबिद सिद्दीक़
न जाने रब्त-ए-मसर्रत है किस क़दर ग़म से
आबिद नामी
आप करिश्मा-साज़ हुए हैं होश में है दीवाना भी
आबिद नामी
ज़िंदगी भर जिन्हों ने देखे ख़्वाब
आबिद मुनावरी
सिर्फ़ कर्ब-ए-अना दिया है मुझे
आबिद मुनावरी
मुक़द्दर में साहिल कहाँ है मियाँ
आबिद मुनावरी
लाला-ज़ारों में ज़र्द फूल हूँ मैं
आबिद मुनावरी
क्यूँ न अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे इतराती हवा
आबिद मुनावरी
ख़ुद सवाल आप ही जवाब हूँ मैं
आबिद मुनावरी
जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए
आबिद मुनावरी
चाँद से अपनी यारी थी
आबिद मुनावरी
बे-तमन्ना हूँ ख़स्ता-जान हूँ मैं
आबिद मुनावरी
और किस का घर कुशादा है कहाँ ठहरेगी रात
आबिद मुनावरी
मियाँ ये इश्क़ तो सब टूट कर ही करते हैं
आबिद मलिक
फ़लक से कैसे मिरा ग़म दिखाई देगा तुझे
आबिद मलिक
अभी से इस में शबाहत मिरी झलकने लगी
आबिद मलिक
कौन कहता है कि वहशत मिरे काम आई है
आबिद मलिक
गले लगाए मुझे मेरा राज़दाँ हो जाए
आबिद मलिक
इक अजनबी की तरह है ये ज़िंदगी मिरे साथ
आबिद मलिक